सूत...
तुम्हारी मेरी जिंदगी समान है कच्चे सूत के चलो न हम दोनों इन सूतों को काटें कुछ बुनें इनसे कुछ उधड़े इन्हें अनगढ़ ही सही पर कुछ तो बनेगा। सूत बेकार है तब तक जबतक गढ़े न कुछ उससे जरूरी नहीं हम दोनों के सूत (जिंदगी) के धागे एक-दूसरे में ही गुंथे अलग भी तो कुछ अच्छा, कुछ खराब बना सकते हैं। अगर मन है तो कोशिश करें, एक साथ दोनों सूतों से कुछ अलग गढ़ने का। नहीं तो अकेले गढ़ने में भी क्या है दिक्कत है ना... दिव्या द्विवेदी