कुुछ कहा और बहुत कुछ अनकहा है...ठीक तुम्हारे पीछे
कहानियों में अक्सर हम आम इंसान खुद के लिए एक सूकुन की तलाश करते हैं, वो जो शायद हमें वास्तविक जीवन में नहीं मिल पाता है, या फिर जिसे हम शायद पा भी नहीं पाते हैं, पर उन कहानियों का क्या जिन्हें पढ़ने पर आप खुद के अकेलपन से मिलने को बैचेन हो जाएं। आपको लगे कि आप अकेले नहीं है जिनके अंदर अकेलापन, स्याहपन है बल्कि ये जो लेखक है न जिसका आप कहानी संग्रह पढ़ रहे हैं वो भी कहीं अपने अकेलेपन और स्याहपन को जी रहा है साथ ही कागज पर उतार भी रहा है। हो सकता है कि कुछ उसका भोगा यथार्थ हो कुछ अकेलेपन की कल्पना मात्र, पर जी तो रहा है ना। मानव कौल थिएटर का एक जाना पहचाना नाम है, उनसे मेरा परिचय दो साल पुराना है वो भी उनके एक नाटक कलर्स ब्लाइंड के जरिए, बेहद ही संवेदनशील ये नाटक कहीं न कहीं मेरे जेहन में बैठ सा गया था जब मैं उसे देखकर आई थी। वर्चुअल दुनिया में किसी इंसान को ढूंढना उतना भी मुश्किल नहीं जितना कि पास रह रहे अपने किसी रिश्ते को ढूंढना। खैर उनके बारे में सारी डिटेल गूगल, फेसबुक और इंस्टाग्राम से मिल गई। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इंस्टाग्राम का अकाउंट मैंने ...