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कुुछ कहा और बहुत कुछ अनकहा है...ठीक तुम्हारे पीछे

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कहानियों में अक्सर हम आम इंसान खुद के लिए एक सूकुन की तलाश करते हैं, वो जो शायद हमें वास्तविक जीवन में नहीं मिल पाता है, या फिर जिसे हम शायद पा भी नहीं पाते हैं,   पर उन कहानियों का क्या जिन्हें पढ़ने पर आप खुद के अकेलपन से मिलने को बैचेन हो जाएं। आपको लगे कि आप अकेले नहीं है जिनके अंदर अकेलापन, स्याहपन है बल्कि ये जो लेखक है न जिसका आप कहानी संग्रह पढ़ रहे हैं वो भी कहीं अपने अकेलेपन और स्याहपन को जी रहा है साथ ही कागज पर उतार भी रहा है। हो सकता है कि कुछ उसका भोगा यथार्थ हो कुछ अकेलेपन की कल्पना मात्र, पर जी तो रहा है ना। मानव कौल थिएटर का एक जाना पहचाना नाम है, उनसे मेरा परिचय दो साल पुराना है वो भी उनके एक नाटक  कलर्स ब्लाइंड  के जरिए, बेहद ही संवेदनशील ये नाटक कहीं न कहीं मेरे जेहन में बैठ सा गया था जब मैं उसे देखकर आई थी। वर्चुअल दुनिया में किसी इंसान को ढूंढना उतना भी मुश्किल नहीं जितना कि पास रह रहे अपने किसी रिश्ते को ढूंढना। खैर उनके बारे में सारी डिटेल गूगल, फेसबुक और इंस्टाग्राम से मिल गई। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इंस्टाग्राम का अकाउंट मैंने ...

उसका यूं जाना...

यूं तो आना जाना जिंदगी की रेलमपेल का एक अभिन्न हिस्सा होता है, लेकिन उसका यूं जाना उसे इस बार बहुत खल गया। वो गया लेकिन इस तरह की उसे खाली कर गया। अपनत्व का वो अहसास जो उसने ही उसके दिल में भरा था आज वो खुद ही उसे खाली करके गया था। उनका आखिर बार मिलना एक फार्मलिटी बन कर ही रह गया था। उसका वो दो शब्द की तुम रोना मत उसकी भावनाओं को झकझोर नहीं पाया था कि वो वाकई रो पाए। कुछ टूट तो रहा था उसके अंदर पर शायद इतनी जोर से नहीं टूटा था कि उसकी चटकन उसके अंदर दर्द का सैलाब ले आए। इमारत अगर एक साथ गिरे तो शायद बहुत दुख होता है लेकिन उसे धीरे- धीरे कर के तोड़ा जाए तो दर्द कम होता है ऐसा ही कुछ उसके साथ भी हो रहा था। वो केवल जा भर नहीं रहा था बल्कि उसके साथ बेउत्तर वो सवाल भी जा रहे थे जो वो उससे पूछना चाहती थी, जानना चाहती थी। हर उस सवाल का जवाब चाहती थी जो उसके दिल- दिमाग में कई दिनों से चल रहे थे... पर जिस तरह वो चला गया ठीक उसी तरह वो अधूर से सवाल  भी चले गए। वो सवाल पूरे तभी होते न जब उनके जवाब उसे मिल जाते। वैसे तो दर्शन की बात करने में वो बहुत ही माहिर है ‘ जिंदगी में तमाम लोग आपसे मिल...

मुझे चांद चाहिए...... जिंदगी को जीने की एक तमन्ना

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क्या हुआ... थोड़ी परेशां लगी रही हो ? पढ़ ली पूरा उपन्यास हां, कल ही रात को खत्म की, उसी का असर है शायद जो चेहरे पर आपको दिखाई दे रहा है। कैसा लगा वो नॉवेल... शानदार था न हां बहुत ही शानदार था। एक बात बोलूं, हां बोलिए न मुझे न उपन्यास की जो नायिका है न, वर्षा वशिष्ठ बहुत ही महत्वाकांक्षी लगी, तुम्हें लगी क्या ? मुझे तो नहीं लगी, आपको वो किस एंगल से महत्वाकांक्षी लगी जरा बताइए तो। मुझे तो हर्ष महत्वाकांक्षी लगा। एक बात बताइए जरा अपने सपने को पूरा करने के लिए कौन सबसे पहले मायानगरी गया था, हर्ष न, कौन वहां के ग्लैमर में खो गया था, हर्ष न, वहां जाकर अपने रिश्तों को कौन नहीं संभाल पाया था, यहां तक कि खुद को भी,   हर्ष न, जलन, कुंठा की भावना किसके अंदर पहले जन्मी, हर्ष के मन में न।  मेरी इन बातों से ये मत समझिएगा कि मैं घोर नारीवादी हूं, बस मैं आपके उस बात का जवाब दे रही हूं जो आपने वर्षा के लिए पूछे हैं। पता है आपको, हम सबके अंदर एक झिलमिल, एक वर्षा हैं, बस बहुत कम लोग हैं जिन्हें दिव्या सान्याल मिल पाती हैं। बहुत कम लड़कियां हैं जो अपने हिस्से के आसमां को पा...

जूड़ा

तुम हमेशा जूड़ा क्यों बाधंती हो? मेरे ये पूछने पर वो हंस देती है और कहती है... पता है.. इसमें मैंने तुम्हारे समाज को बांधा है समाज और जूड़े में भला क्या संबंध? संबंध तो हर किसी “ का ” हर किसी “ से ” है अपने इस जूड़े में मैं बांधती हूं समाज की रूढ़ियों को उन जंजीरों को बांधती हूं जो आगे बढ़ने से रोकती हैं मुझे उन बेमकसद के सवालों को बांधती हूं जो हर दफा मेरे घर से निकलने पर पूछे जाते हैं उस सोच को बांधती हूं जो मुझे एक लड़की सोच कमतर समझती है उन तानों को बांधती हूं जो मेरे असफल होने पर मुझे मिलते हैं उन निगाहों को भी जूड़े में समेटती हूं जो मुझे सिर्फ जिस्म समझते हैं उन सारी रस्मों को बांधती हूं जो एक लड़की होने के नाते मुझपर थोपे गए हैं और भी बहुत कुछ बांधती हूं इस जूड़े में कभी जो बाल खुल जाते है न मेरे तो ऐसा लगता है कि वो सारी रुकावटें मेरे सामने आ गई सुनो... सुंदर दिखने के लिए नहीं बांधती मैं अपने बालों को  बस खुद को आज़ाद रखने के लिए बांधती हूं इन्हें ताकि “ लट ” के रूप में कोई बाधा न आ जाए। दिव्या

छोड़ना इतना आसां नहीं...

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कभी-कभी सोचती हूं, घर छोड़ना इतना आसां होता है क्या, जितना हमें लगता है या दिखता है... जवाब पता है इसका और वो है नहीं। खासकर लड़कियों के लिए। हमारी सोसाइटी बहुत जटिल है शायद । कभी भी हमारे लिए चीजें आसान नहीं बनाती है (खासकर की लड़कियों के लिए)। वो लड़कियां जो घर छोड़कर जाती होंगी, कितना कुछ टूटता होगा न उनके अंदर। टूटन सिर्फ रिश्तों में नहीं होता है, खुद के अंदर भी बहुत कुछ टूटता है, जुड़ता है। और ये टूटना न तो दिखता है और न ही इसे किसी से बयां किया  जा सकता है। एक पल और एक फैसला... कि छोड़ना है, क्यों, किसलिए, ये बेहद निजी बातें होती हैं... पर वाकई में एक कड़ा फैसला होता है। वो सारे रिश्तें, बातें, आदतें, लम्हें, हंसी, आंसू सब छोड़कर अकेले एक शुरुआत करना, वो भी अपने दम पर, इतना आसान तो नहीं होता। पर वजह भी तो अपनी-अपनी होती है छोड़ने की। एक लड़का जब घर छोड़ के जाता है तो भावुकता के पहलू में वो भी अकेला होता है पर सामाजिक तौर पर नहीं, पर एक लड़की अगर जब ऐसा कदम उठाती है तो वो हर जगह से अकेली होती है। इस फैसले की वजह चाहे कुछ भी हो पर इस फैसले पर टिके रहना, खुद से लड़ना, सो...