छोड़ना इतना आसां नहीं...

कभी-कभी सोचती हूं, घर छोड़ना इतना आसां होता है क्या, जितना हमें लगता है या दिखता है... जवाब पता है इसका और वो है नहीं। खासकर लड़कियों के लिए। हमारी सोसाइटी बहुत जटिल है शायद । कभी भी हमारे लिए चीजें आसान नहीं बनाती है (खासकर की लड़कियों के लिए)। वो लड़कियां जो घर छोड़कर जाती होंगी, कितना कुछ टूटता होगा न उनके अंदर। टूटन सिर्फ रिश्तों में नहीं होता है, खुद के अंदर भी बहुत कुछ टूटता है, जुड़ता है। और ये टूटना न तो दिखता है और न ही इसे किसी से बयां किया जा सकता है।
एक पल और एक फैसला... कि छोड़ना है, क्यों, किसलिए, ये बेहद निजी बातें होती हैं... पर वाकई में एक कड़ा फैसला होता है। वो सारे रिश्तें, बातें, आदतें, लम्हें, हंसी, आंसू सब छोड़कर अकेले एक शुरुआत करना, वो भी अपने दम पर, इतना आसान तो नहीं होता। पर वजह भी तो अपनी-अपनी होती है छोड़ने की। एक लड़का जब घर छोड़ के जाता है तो भावुकता के पहलू में वो भी अकेला होता है पर सामाजिक तौर पर नहीं, पर एक लड़की अगर जब ऐसा कदम उठाती है
तो वो हर जगह से अकेली होती है। इस फैसले की वजह चाहे कुछ भी हो पर इस फैसले पर टिके रहना, खुद से लड़ना, सोसाइटी से लड़ना, उन तोहमतों से लड़ना जो अकेले रहने के फैसले से उसपर लगाई जाती हैं, उन आंखों से लड़ना जो अकेला जान उस पर लगी रहती हैं । पर फिर भी एक फैसला ले लेना, चाहे वो खुद के भविष्य के लिए हो, आजादी के लिए हो, प्यार के लिए हो या कोई और वजह... मैं इसलिए ये सब नहीं लिख रही कि मेरी किसी दोस्त ने ऐसा किया, बल्कि ये सब इसलिए लिख रही हूं कि कईयों को जिन्हें मैं जानती नहीं ऐसा फैसला किया है या किया होगा... समाज ऐसी लड़कियों को हौसला बढ़ाने के बजाय गाली देता है और तोहमते लगाता है। इस समाज में चाहे जितना भी महिलासशक्तिकरण की बात हो पर अकेली लड़की के रहने के मुद्दे पर यह समाज कभी आधुनिक नहीं हो सकता है, या कहें अभी इस मुद्दे पर परिपक्व नहीं हो पाया है हमारा भारतीय समाज।
एक लड़की के नोट्स

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