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गुमसुम सा वो पाठक

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हिंदी साहित्य की यह विडंबना है कि आज के समय में लेखक ज्यादा हैं पाठक कम... इस माहौल में ऐसे सुधी पाठक देख मन को सुकून मिलता है। पुस्तक मेला में विभिन्न प्रकाशनों के स्टॉल्स घूमने के दौरान यह सज्जन मुझे पूरी तल्लीनता के साथ उस बेहद कम भीड़ वाले प्रकाशन स्टॉल पर किताब पढ़ने में मशगूल दिखे। मेला के दौरान कई बार मैंने इन्हें एक स्टॉल से दूसरे स्टॉल जाते देखा। पर कुछ बात थी इनमें जो हिंदी के अन्य पाठकगणों से इन्हें अलहदा बना रही थी। मैंने देखा कि यह उन प्रकाशनों के स्टॉल्स पर नहीं जा रहे थे जहां सोशल मीडिया के प्रसिद्ध लेखकों और उनके आगे-पीछे मधुमक्खियों के छत्ते की भिनभिनाहट सी सो कॉल्ड पाठकों की भीड़ थी, यह चुपचाप उन प्रकाशनों में जा रहे थे जहां ज्यादा भीड़ नहीं थी और पूरी संजीदगी के साथ एक-एक किताब देख रहे थे कुछ अच्छी लग रही थीं तो उन्हें पढ़ रहे थे। एक प्रकाशन से दूसरे प्रकाशन जाने के दौरान मैंने इनके अंदर किताबों के लेकर एक तड़प देखी, जैसे कुछ ढूंढ रहे हैं जो मिल नहीं रहा है।  किताबों के लेकर यह अकुलाहट मैं समझ सकती हूं क्योंकि मैंने भी कभी दो किताबों की खोज में वो बे...