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कायरता नहीं...बस कोई बात करने वाला नहीं मिलता है

ड्राइंग रूम में चाय का कप लेकर ये डिस्कशन करना कि यार पागल थी लड़की जिसने सुसाइड कर लिया, अरे उस लड़के को ऐसी भी क्या फ्रस्टेशन की पंखे पर झूल गया, सोशल मीडिया पर rip लिख देना भी बहुत आसान है और ये जजमेंट पास कर देना कि कायर लोग होते हैं जो सुसाइड करते हैं... लेकिन हम कभी ये नहीं सोचते कि वो इंसान कितना टूट चूका होगा जब उसने ये फैसला किया होगा, उसके आस-पास शायद कोई नहीं होगा तभी तो वो अपनी बात कह नहीं पाया और मौत से बात करने चल दिया। ये कह देना कि सुसाइड कायरता है बहुत आसान है पर वाकई में मौत को गले लगाना इतना भी आसान नहीं। जब कोई बुरी तरह से टूट जाए, कोई ऑप्शन न बच सके, तब ये फैसला लेना भी कठिन होता है कि सारे रिश्ते को तोड़ मौत को गले लगा लें क्या। एक वाक्या याद है मुझे मेरी एक कलीग एक दिन बहुत उदास होकर आई, पूछने पर बताया कि उसके पड़ोस में एक टीनएज लड़की ने सुसाइड अटेम्प्ट कर लिया। मेरी कलीग ने उस दिन कहा कि यार मेरी गलती है, मैंने पूछा क्यों, तो बोली कि वो लड़की कई दिन से कह रही थी कि दीदी आपसे कोई जरूरी बात करनी है पर मैं अपने काम, अपनी रिपोर्टिंग में इतनी बिजी थी कि उससे बात ...

सिर्फ शहर भर नहीं है... जयपुर

जयुपर सिर्फ एक शहर भर नहीं है मेरे लिए बल्कि वो है घर से पहली बार अकेली आई लड़की का इस्तकबाल करता मेज़बान, पहली नौकरी की खुशी में खुश होता जैसे गुलाबी गाल, घर से पीजी और पीजी से अपने कमरे तक का सफर, अनजानों के बीच अपनों को खोजना, ऑफिस के माहौल को घर में तब्दील करना, चौड़ा रास्ता से निकलकर अजमेरी गेट तक जाना, छोटी चौपड़ और बड़ी चौपड़ में खरीदारी करना, एम आई रोड के शोरूम को जी भर के देखना और लस्सीवाले के यहां से समोसे, लस्सी पीना, मालवीय नगर की हर गोलगप्पे के ठेले का स्वाद चखना। वो है पहली कमाई की ढेर सारी शॉपिंग करना, संडे की मस्ती जीटी में बिताना, world tread park के सिने पॉलिस में सस्ती दर में फिल्में देखने के लिए संडे की सुबह की नींद खराब करना, पहली बार सलवार सूट पहनने वाली लड़की का शर्ट और जींस पहनकर थिएटर में पहली बार फिल्म देखना, मैक डी में पहली बार फ्रेंच फ्राइज खाते हुए दोस्तों की हंसी वाला ताना सुनना कि ये तो देवी का अवतार है जो पहली बार मैक डी में आई हैं, मदर्स डे पर मां से दूर होने के बाद भी मैक डी जाकर उस दिन को सेलिब्रेट करना, घर वालों से दूर पहला जन्मदिन शानदार तरीके स...

फैंटेसी और ख्वाहिश

सुनों, क्या... अरेंज मैरिज को लेकर तुम्हारी सबसे बड़ी फैंटेसी या कहें विश क्या है अरेंज मैरिज....सच कहूं तो मैं ये चाहती हूं कि शादी के बाद किसी एक शाम हम दोनों अपने दो कप चाय के साथ अपनी सारी पुरानी बातें याद कर उन्हें कहें, उस प्यार के बारे में कहें जिसे पीछे छोड़ हम शादी के बंधन में बंधें। वो कसक, वो सारी बातें, सारे दुख, खुशी, गिले-शिकवे, उस रिश्ते से जुड़ी हमारी ख्वाहिशें और अंत सब पर हम दोनों बात करें। इस दौरान हम दोनों का अगर मन हो तो दोनों किसी फार्मेलिटी के खूब रो लें, ये सोचे बिना की हम किस लिए रो रहे हैं, किसके लिए रो रहे हैं और किसके सामने रो रहे हैं... बस रो लें और जब रात का गाढ़ापन बढ़ जाए तो चाय का कप ले कर जब वो उठे न तो एक हाथ मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहे, चलो यार, वो दोनों जहां रहें खुश रहें, वो दोनों भी तो हमारे बारे में यहीं सोच रहे होंगे कि हम खुश होंगे तो चलो उठो इस रात से एक नई शुरुआत करें ताकि अगले दिन का सूरज हमारे रिश्ते को अनजान लोगों की तरह नहीं देखे बल्कि उसे लगे कि इस रिश्ते में चांद का भी कुछ हिस्सा घुल चुका है बस मुझे इसमें थोड़ा अपना हिस्सा मिलना है.... ...

अपनी वाली जिंदगी

लव मैरिज या अरेंज, लव, लव क्यों, वो इसलिए दूसरों की गलती पर पछताने से बेहतर है कि अपनी गलती पर पछताओ। खुद को कंसोल करना ज्यादा आसान रहता है कि अबे यार गलती हो गई, इंसान ही तो हैं। पर ऐसा लड़कियों को करने कहां दिया जाता है। सही कहा, बचपन से सब्जेक्ट से लेकर सूट की डिजाइन और किस लड़के से शादी करनी है, तक पिता और भाई की मर्जी। प्यार करना है और प्यार में शादी करनी है या नहीं ये प्रेमी महोदय डिसाइड करते हैं। शादी के बाद कब बच्चा पैदा करना है, कितना करना है, किस जेंडर का करना है ये  इनलॉज डिसाइड करते हैं। जॉब करनी है या नहीं, जॉब में किससे बात करनी है, किससे नहीं ये पति डिसाइड करते हैं। उसके बाद घर में खाना क्या बनेगा इस पर पति, सास-ससुर, बच्चे की मर्जी। अधेड़ होते-होते और लड़की से औरत बनने के सफर में हम अपना नाम, अपनी पसंद, अपनी मर्जी तक भूल जाते हैं। दूसरों का ही याद रहता है सबकुछ। और सबसे डरावनी बात ये है कि अकेले बैठकर सोचने पर भी अपना ख्याल रत्ती भर नहीं आता है बल्कि आसपास की माया में घिरी रहती हैं हम। हम अपने बारे में न सोचे इसके लिए कहा जाता है स्त्री का हृदय विशाल होता है...

उदास दोपहर

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उदास दोपहरें, उदास और अकली नहीं होती उनमें कुछ बातें होती हैं कुछ पिछला होता है कुछ पुरानी चिट्ठियां होती हैं कुछ खुद के ऊपर आया गुस्सा होता है, उदास दोपहरें, उदास और अकली नहीं होती उदास दोपहरों में भी आती है, होंठों पर मुस्कान, उदास दोपहरें ही बनती हैं डायरी की राजदार, उदास दोपहरों में ही, आई एक उबासी और फिर छोड़ी गई गहरी सांस ही, खुद के ऊपर जीने वाला लम्हा सा लगता है। उदास दोपहरों की दोस्त होती हैं उदास शामें और रात जब तीनों एक साथ होती हैं तो उदास दोपहर, वाकई में उदास और अकेली नहीं होती। दिव्या

कमरे वाला कोना

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कमरे को लेकर एक अजीब तरह का आकर्षण उसे बचपन से था, बचपन में भाई-बहनों के साथ कमरा शेयर करती थी, बड़ी हुई तो मां के साथ, बाहर पढ़ने और नौकरी करने गई तो पीजी के कमरे में भी दो लड़कियों के साथ शेयर करना पड़ा, रूम लिया तो उसमें भी एक लड़की के साथ शेयर करना मजबूरी बन गई। शादी के बाद एक अनजाने पुरुष के साथ (जो पति था शायद उसका) कमरा शेयर करना पड़ा।  पर अपने कमरे की कसक जो उसके मन में थी वो बदस्तूर रही। पता नहीं क्यों, उसने अपनी इस ख्वाहिश को कभी मरने नहीं दिया। उसकी हर ख्वाहिश और सपने खत्म हो जाते थे जब कोई उस पर अपनी ख्वाहिशातों को थोपता था पर इस ख्वाहिश को उसने सबसे बचाकर रखा था, कभी किसी से नहीं बताया कि उसे एक कमरे की दरकार है। जिंदगी आपको मौका देती है, दिल से देती है अगर आप वाकई में दिल से उससे कुछ मांगे तो... जिंदगी ने उसे भी मौका दिया, सबसे अलग, एक शहर में, एक कमरे वाला उसका घर था। जिसमें वो रहती थी, अकेले... नहीं-नहीं अकेले नहीं बल्कि, अपनी बदमाशियों, अपनी रचनात्मकता, अपने सपने, अपनी अलग सोच, अपनी लाइफस्टाइल, अपनी आजादी, अपनी अल्हड़पन, अपने बिखरे स्वभाव, अपनी अधूरी ख्वाहिशों औ...

मैं अस्थिर हूं...

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मैं स्त्री हूं, इसलिए मैं अस्थिर हूं, स्थिर होती तो नहीं जी पाती दो जिंदगियां मैं अस्थिर हूं, तभी शायद जिंदा हूं, दोनों समाज में एक समाज जो है मेरा खुद का दूजा जो दूसरों ने बनाया। अस्थिर हूं इसलिए बन पाती हूं मां खुद को भी संभालती हूं मां के जैसे, और अपने पुरुष के दिए जीवन को भी। अस्थिर हूं, क्योंकि नदी हूं खुद के बहाव को अपने अंदर के पानी को चट्टानों के अनुरूप देती हूं मोड़ मेरा अस्थिर होना ही, शायद  चट्टान को चिकना कर देता है क्योंकि मेरे पानी ने उसका झेला है नुकीलापन, तब कहीं जाकर कर पाई हूं उसे अपने अनुरूप अस्थिर हूं, तभी तो बना पाई मन को बावरा, जो ठहरता ही नहीं कहीं। अस्थिर हूं, इसलिए किसी एक भाव पर टिकती नहीं हूं, हर भाव को समरूप जीती हूं। अस्थिर हूं, तभी शायद मौका मिलते ही अपने अस्तित्व का छाप छोड़ देती हूं किसी के मन में, स्थिर होती तो शायद गुम हो जाती, टूट जाती या फिर जाती बिखर खुश हूं कि अस्थिर हूं, खुश हूं कि स्त्री हूं दिव्या

नया स्टेप, जिंदगी वाला...

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मोबाइल ने एक परसेंट बैटरी बताई फिर टू टू करते हुए खुद को बंद कर लिया, रमा ने वोदका का अभी दूसरा सिप ही लिया था। बहुत बेमन से उसने मोबाइल देखा और फिर से वोदका पीने लगी। कॉलेज टाइम से उसे वोदका पीने का बहुत मन करता था, कि आखिर इसका स्वाद होता कैसा है। मौका मिला 15 साल बाद वो भी आज के दिन। एक नई शुरूआत वाले दिन। शुरुआत तो साल भर पहले ही हो गई थी बस आज एक तरह से सत्यनारायण की पूजा हुई है जैसे। पिछले साल की ही तो बात है सिंतबर का महीना था (रमा के दो सबसे प्यारे महीने हैं सितंबर और अक्टूबर, उस दौरान जो हवाओं में सिहरन, धूप में गुनगुनापन होता है न उसे महसूस करते हुए वो खुद को यश चोपड़ा की हीरोइन से कम कभी नहीं समझती थी) और गणपति विसर्जन का दिन था, ढोल की आवाज़ उसके कानों में पड़ रही थी, लाख कोशिश करने के बावजूद भी वो अपने पैरों को थिरकने से रोक नहीं पा रही थी। अचानक से पता नहीं उसके मन में क्या आया कि प्रसाद का बहाना करके बिल्डिंग से उतर नीचे सोसाइटी के ग्राउंड में आ गई और देखते-देखते क्या झूम के नाची की हर किसी आंखें अपनी साइज से दोगुनी तो हो ही गई थीं। खैर पसीने से लथपथ जब वो फ्लैट का दरव...

अस्तित्व विसर्जन

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जब भी गणपति विसर्जन या दुर्गा विसर्जन देखती हूं तो अक्सर ये लगता है कि हम लड़कियां भी शादी के बाद विसर्जित ही की जाती हैं, पानी की जगह होता है नए घर का वातावरण। हमें पूर्ण रूप से अपने अस्तित्व को उसमें मिला देना होता है। हम जो मां के गर्भ से लेकर अब तक जैसे भी रही हैं हमें खुद को मिटाना। एक आर्दश स्त्री (जिसमें स्त्री के सारे रूप आते हैं) वाली अवधारणा को पूरा करने के लिए सम्पूर्ण रूप से खुद को उस पानी में घोल देना होता है जिसे हमारे परिवार वालों ने या कई बार बाई डिफाल्ट हमने  खुद चुना होता है। बचपन से बड़े होने तक हमें दूसरे परिवार के अनुरूप जीवन जीने के लिए गढ़ा जाता है एक मिशन के तौर पर ताकि परिवार वालों पर ये आरोप न लगे कि आपकी बिटिया तो हमारे पानी में घुल ही नहीं पाई, कुछ न कुछ तो साबुत रह ही गया। कई बार अजीब लगता है कि हमें हमारी जिंदगी के लिए नहीं गढ़ा जाता है बल्कि दूसरे परिवार और उस आने वाले लड़के के लिए गढ़ा जाता है। ये तैयारियां बचपन से चलती हैं। ऐसी ही कोई तैयारी लड़का करता है क्या? क्या उसके मां-पिता उसके जीवन में आने वाली भावी लड़की के लिए उसे तैयार करते हैं? कि उसे क...

प्रैक्टिकल वर्सेज इमोशनल

कल की फोटो-पोस्ट शानदार लिखी थी तुमने... कहां की थी अरे वो सिविल लाइन्स के एक रेस्त्रां के बाहर वाली सड़क की थी.... अच्छी लगी न तुम्हें, लाइक्स भी मिले कई उसपर और कमेंट्स की भरमार हो गई। हां देखा था मैंने, एक बात पूंछू, बुरा तो नहीं मानोगे हां-हां पूछो न कमेंट्स, पोस्ट की बात को अगर दरकिनार कर दिया जाए तो तुमने उस इंसान को देखकर सबसे पहले क्या सोचा था सच कहूं तो यही सोचा था कि ये इंसान एक बेहतर सब्जेक्ट हो सकता है क्यों न इस पर लिखा जाए। हम्म, उसके अलावा उसके अलावा... इससे क्या मतलब मतलब ये कि उसके हाथ में जो बेचने वाला सामान था उसे क्यों नहीं खरीदा, ठीक है वो तुम्हारे लिए एक बेहतरीन सब्जेक्ट था लिखने के लिए पर अगर इस सोच के अलावा तुम थोड़ा बहुत इंसानी जज्बात रखते तो कितना बेहतरीन हो जाता न। तुम्हारे पोस्ट पर लाइक्स तो मिलते ही साथ ही तुम्हें भी कुछ सुकुन हो जाता कि तुमने अपने सब्जेक्ट की मदद तो की। सोचो न तुम उसका सामान खरीदते तो उसे कितना अच्छा लगता, एक सुकून वाली मुस्कान उसके चेहरे पर भी होती और तुम्हारे मन और होंठों पर भी। शब्द तुम्हें लाइक्स दे सकते हैं पर भावन...

अछूत कन्या

अरे, अरे, फिर सामने पड़ गई, हटो सामने से, तुम्हें मना किया है न कि महीने के उन दिनों में तुम पूजा के लिए जाते वक्त मेरे सामने न पड़ा करो। तो मैं कहां आपके सामने आ गई, आप ही आई हैं मेरे सामने अरे राम रे लड़की तुलसी के पौधे से सटकर क्यों खड़ी है, तुलसी मुरझा जाएंगी... मना किया है न कि उन दिनों में तुलसी के पौधे को नहीं छूते। हद है, क्यों नहीं छूते... मैं तो हर वक्त इन्हें पानी देती हूं, समझीं, क्या ये मुरझाईं और एक बात ये पौधे हैं, इन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि मेरे शरीर में क्या बदलाव हो रहा है, बस इन्हें एक चीज से फर्क पड़ता है कि मेरा स्वभाव न बदले, ये प्यार करते हैं मुझे और मैं इनसे। अच्छा एक बात कहूं मां, मां पूजा का काम करते हुए बोली, हां बोलो... अच्छा नानी भी आपके साथ ऐसा व्यवहार करती थीं जैसा आप मेरे साथ करती हैं ? हां, जब तुम्हारी उम्र की थी न मैं , तो नानी भी यही सब करती थीं मेरे साथ तब आपको कैसा महसूस होता था ? वैसा ही महसूस होता था, जैसा अब तुम्हें हो रहा है, बहुत गुस्सा आता था... तो आपने कोई विरोध क्यों नहीं किया ? मां कुछ खोए हुए अंदाज में बोलते हुए,...

अपने हिस्से के रिश्ते.......

नैना तुम अरेंज मैरिज कर रही हो.... भड़ाक से दरवाजा खोलते हुए सारिन्धा का ये पहला सवाल था। ओह्ह हो तो सारिन्धा मोहरतमा आखिरकार अपने बिजी शेड्यूल से वक्त निकालकर हमारी शादी में तशरीफ ले ही आईं। वेट...ये बकवास छोड़ो, जो पूछा है वो बताओ। तुम वाकई में शादी कर रही हो... आई मीन वो तुम्हारा पागलपन वाला प्यार, वो रिश्ता वो क्या हुआ नैना, ये अरेंज मैरिज वो भी तुम.... नैना हंसते हुए- तो क्या नहीं कर सकती मैं, बोलो, कोई अजूबा तो नहीं कर रही न मैं। नैना प्लीज अपनी बकवास बंद करो जो पूछा है उसका जवाब दो... जी हां आपने सही सुना है मोहतरमा मैं पूरे होशो हवास में अरेंज मैरिज... जी हां अरेंज मैरिज कर रही हूं... आई नो तुम शॉक हो.... पर देखो प्रैक्टिकल हो के सुनों जो मैं कहने जा रही हूं... देखो वो सिर्फ और सिर्फ प्रेमी था, जिसने मुझसे प्रेम किया, उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी की और चला गया, बाकी जो बचा हुआ हिस्सा था न जिसमें शादी, फैमिली प्लानिंग, बच्चे, होम लोन, ई एम आई, रिश्तेदारी की झझंट, घर का हो हल्ला, शादीशुदा जिंदगी की अपनी मशक्कत, पति-पत्नी की खटपट आदि की जिम्मेदारी वो मेरे होने वाले पति मह...

एक‬ कहानी ख्वाहिश की...

निवेदिता कहां है आजकल? वो, दमन और दीऊ में अपनी यात्रा के मजे ले रही है। कितनी बेहतरीन जिंदगी जी रही है वो... पैरों में स्पोर्ट्स शूज, पीठ पर एक बैग, गले में एक शानदार कैमरा और पॉकेट और डेबिट कार्ड में पैसे। जिंदगी में और क्या चाहिए। कई बार अपनी बेटी की ये जिंदगी देखकर सोचती हूं जिंदगी में ज्यादा चीजों की दरकार दरअसल इतनी होती नहीं है जितनी हम शो करते हैं। बात तो तुमने सही कही है, निवेदिता का सपना रहा होगा न ये... सच कहूं तो ये सपना मेरा था, जब वो गर्भ में थी न मेरे तो रोज अप ने इसी सपने को अकेले में बैठ उससे साझा करती थी। मुझे वाकई नहीं पता था कि बड़े होने पर मेरा वही सपना वो जीएगी। पता है जब पहली बार वो निकली थी न यूं घूमने तो पता है उसने मुझसे कहा था कि मां आपका सपना जीने जा रही हूं वो भी अपनी आंखों से...पता है मां अक्सर मां-बाप अपने सपने बच्चे पर थोपते हैं कि फलां बनों, पैसे कमाओ, रूतबा बनाओ, पर आपने तो सपने में मुझे जिंदगी दे दी वो जिंदगी जो सिर्फ मेरी है, इसलिए आपके सपने को मैंने अपनी जिंदगी मान ली। अब जब कहीं भी जाती है तो फोनकर पता है क्या कहती है कि मां जिस भी जगह जाती हूं...

कुछ‬ लिखा, खोया हुआ सा...

तुम लेखक भी अजीब होते हो... क्यों ? अरे, तुम लोगों को कहीं कोई कागज का टुकड़ा दिखा नहीं कि लिख देते हो अपने दिल की बात। वो हंसते हुए... अच्छा तो ये बात है। वैसे तुमने ये बात तो सही कही है, इसी आदत के चलते देखो पूरे दो घंटे से परेशान हो रही हूं। क्यों भला?  अरे कोई पीस लिखा था किसी कागज पर अब ढूंढ रही हूं कि रखा कहां है... तुम्हें कोई कागज मिला है क्या जो तुम वो बात कह रहे थे अभी। हां मिला है न... तब भी तो कह रहा था कि तुम लोग कागज देखते ही अपनी दिल की बात लिख देते हो। अच्छा ये बाताओ लिखा क्या है? अरे चुप क्यों बताओ न क्या पता मेरा खोया हुआ वही पीस हो, जिसे ढूंढ रही हूं इतनी देर से। हां सही कहा खोया हुआ है.... बोलो भी क्या लिखा है उसपर मैंने वो......शांतनु के बारे में लिखा है.... वो चुप हो जाती है, थोड़ी देर बाद बोलती है, कुछ खोए हुए लोग आपको कागज में ही मिलते हैं। वो तब भी खामोश रहता है। पता है मैं अपना लिखा सहेज कर क्यों नहीं रखती, इधर-उधर क्यों किसी कागज पर लिख देती हूं, इसलिए क्योंकि तुम उन सारे लिखे हुए को संभाल लेते हो जिस तरह मुझे संभाले हुए हो न जाने कितने सालों से। ...

कुुछ कहा और बहुत कुछ अनकहा है...ठीक तुम्हारे पीछे

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कहानियों में अक्सर हम आम इंसान खुद के लिए एक सूकुन की तलाश करते हैं, वो जो शायद हमें वास्तविक जीवन में नहीं मिल पाता है, या फिर जिसे हम शायद पा भी नहीं पाते हैं,   पर उन कहानियों का क्या जिन्हें पढ़ने पर आप खुद के अकेलपन से मिलने को बैचेन हो जाएं। आपको लगे कि आप अकेले नहीं है जिनके अंदर अकेलापन, स्याहपन है बल्कि ये जो लेखक है न जिसका आप कहानी संग्रह पढ़ रहे हैं वो भी कहीं अपने अकेलेपन और स्याहपन को जी रहा है साथ ही कागज पर उतार भी रहा है। हो सकता है कि कुछ उसका भोगा यथार्थ हो कुछ अकेलेपन की कल्पना मात्र, पर जी तो रहा है ना। मानव कौल थिएटर का एक जाना पहचाना नाम है, उनसे मेरा परिचय दो साल पुराना है वो भी उनके एक नाटक  कलर्स ब्लाइंड  के जरिए, बेहद ही संवेदनशील ये नाटक कहीं न कहीं मेरे जेहन में बैठ सा गया था जब मैं उसे देखकर आई थी। वर्चुअल दुनिया में किसी इंसान को ढूंढना उतना भी मुश्किल नहीं जितना कि पास रह रहे अपने किसी रिश्ते को ढूंढना। खैर उनके बारे में सारी डिटेल गूगल, फेसबुक और इंस्टाग्राम से मिल गई। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इंस्टाग्राम का अकाउंट मैंने ...

उसका यूं जाना...

यूं तो आना जाना जिंदगी की रेलमपेल का एक अभिन्न हिस्सा होता है, लेकिन उसका यूं जाना उसे इस बार बहुत खल गया। वो गया लेकिन इस तरह की उसे खाली कर गया। अपनत्व का वो अहसास जो उसने ही उसके दिल में भरा था आज वो खुद ही उसे खाली करके गया था। उनका आखिर बार मिलना एक फार्मलिटी बन कर ही रह गया था। उसका वो दो शब्द की तुम रोना मत उसकी भावनाओं को झकझोर नहीं पाया था कि वो वाकई रो पाए। कुछ टूट तो रहा था उसके अंदर पर शायद इतनी जोर से नहीं टूटा था कि उसकी चटकन उसके अंदर दर्द का सैलाब ले आए। इमारत अगर एक साथ गिरे तो शायद बहुत दुख होता है लेकिन उसे धीरे- धीरे कर के तोड़ा जाए तो दर्द कम होता है ऐसा ही कुछ उसके साथ भी हो रहा था। वो केवल जा भर नहीं रहा था बल्कि उसके साथ बेउत्तर वो सवाल भी जा रहे थे जो वो उससे पूछना चाहती थी, जानना चाहती थी। हर उस सवाल का जवाब चाहती थी जो उसके दिल- दिमाग में कई दिनों से चल रहे थे... पर जिस तरह वो चला गया ठीक उसी तरह वो अधूर से सवाल  भी चले गए। वो सवाल पूरे तभी होते न जब उनके जवाब उसे मिल जाते। वैसे तो दर्शन की बात करने में वो बहुत ही माहिर है ‘ जिंदगी में तमाम लोग आपसे मिल...

मुझे चांद चाहिए...... जिंदगी को जीने की एक तमन्ना

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क्या हुआ... थोड़ी परेशां लगी रही हो ? पढ़ ली पूरा उपन्यास हां, कल ही रात को खत्म की, उसी का असर है शायद जो चेहरे पर आपको दिखाई दे रहा है। कैसा लगा वो नॉवेल... शानदार था न हां बहुत ही शानदार था। एक बात बोलूं, हां बोलिए न मुझे न उपन्यास की जो नायिका है न, वर्षा वशिष्ठ बहुत ही महत्वाकांक्षी लगी, तुम्हें लगी क्या ? मुझे तो नहीं लगी, आपको वो किस एंगल से महत्वाकांक्षी लगी जरा बताइए तो। मुझे तो हर्ष महत्वाकांक्षी लगा। एक बात बताइए जरा अपने सपने को पूरा करने के लिए कौन सबसे पहले मायानगरी गया था, हर्ष न, कौन वहां के ग्लैमर में खो गया था, हर्ष न, वहां जाकर अपने रिश्तों को कौन नहीं संभाल पाया था, यहां तक कि खुद को भी,   हर्ष न, जलन, कुंठा की भावना किसके अंदर पहले जन्मी, हर्ष के मन में न।  मेरी इन बातों से ये मत समझिएगा कि मैं घोर नारीवादी हूं, बस मैं आपके उस बात का जवाब दे रही हूं जो आपने वर्षा के लिए पूछे हैं। पता है आपको, हम सबके अंदर एक झिलमिल, एक वर्षा हैं, बस बहुत कम लोग हैं जिन्हें दिव्या सान्याल मिल पाती हैं। बहुत कम लड़कियां हैं जो अपने हिस्से के आसमां को पा...

जूड़ा

तुम हमेशा जूड़ा क्यों बाधंती हो? मेरे ये पूछने पर वो हंस देती है और कहती है... पता है.. इसमें मैंने तुम्हारे समाज को बांधा है समाज और जूड़े में भला क्या संबंध? संबंध तो हर किसी “ का ” हर किसी “ से ” है अपने इस जूड़े में मैं बांधती हूं समाज की रूढ़ियों को उन जंजीरों को बांधती हूं जो आगे बढ़ने से रोकती हैं मुझे उन बेमकसद के सवालों को बांधती हूं जो हर दफा मेरे घर से निकलने पर पूछे जाते हैं उस सोच को बांधती हूं जो मुझे एक लड़की सोच कमतर समझती है उन तानों को बांधती हूं जो मेरे असफल होने पर मुझे मिलते हैं उन निगाहों को भी जूड़े में समेटती हूं जो मुझे सिर्फ जिस्म समझते हैं उन सारी रस्मों को बांधती हूं जो एक लड़की होने के नाते मुझपर थोपे गए हैं और भी बहुत कुछ बांधती हूं इस जूड़े में कभी जो बाल खुल जाते है न मेरे तो ऐसा लगता है कि वो सारी रुकावटें मेरे सामने आ गई सुनो... सुंदर दिखने के लिए नहीं बांधती मैं अपने बालों को  बस खुद को आज़ाद रखने के लिए बांधती हूं इन्हें ताकि “ लट ” के रूप में कोई बाधा न आ जाए। दिव्या