अस्तित्व विसर्जन

जब भी गणपति विसर्जन या दुर्गा विसर्जन देखती हूं तो अक्सर ये लगता है कि हम लड़कियां भी शादी के बाद विसर्जित ही की जाती हैं, पानी की जगह होता है नए घर का वातावरण। हमें पूर्ण रूप से अपने अस्तित्व को उसमें मिला देना होता है। हम जो मां के गर्भ से लेकर अब तक जैसे भी रही हैं हमें खुद को मिटाना। एक आर्दश स्त्री (जिसमें स्त्री के सारे रूप आते हैं) वाली अवधारणा को पूरा करने के लिए सम्पूर्ण रूप से खुद को उस पानी में घोल देना होता है जिसे हमारे परिवार वालों ने या कई बार बाई डिफाल्ट हमने खुद चुना होता है। बचपन से बड़े होने तक हमें दूसरे परिवार के अनुरूप जीवन जीने के लिए गढ़ा जाता है एक मिशन के तौर पर ताकि परिवार वालों पर ये आरोप न लगे कि आपकी बिटिया तो हमारे पानी में घुल ही नहीं पाई, कुछ न कुछ तो साबुत रह ही गया। कई बार अजीब लगता है कि हमें हमारी जिंदगी के लिए नहीं गढ़ा जाता है बल्कि दूसरे परिवार और उस आने वाले लड़के के लिए गढ़ा जाता है। ये तैयारियां बचपन से चलती हैं। ऐसी ही कोई तैयारी लड़का करता है क्या? क्या उसके मां-पिता उसके जीवन में आने वाली भावी लड़की के लिए उसे तैयार करते हैं? कि उसे कैसा व्यवहार करना है, कैसे उस भावी लड़की के लिए खुद को घोल देना है उसके पानी (जीवन) में। भारतीय समाज को देखकर ऐसा लगता तो नहीं है (हां अपवाद हो सकते हैं कुछ, अपवाद की अवधारणा इसलिए मैं रखती हूं ताकि दिल में कहीं न कहीं, सकारात्मकता के कुछ अंश शेष रहें मेरे खुद के अंदर)। अक्सर ये सोचते हुए जब अपने आसपास की महिलाओं को देखती हूं न (जिसमें मेरी मां, दादी, नानी, बहन, कलीग्स, दोस्त, और कोई अनजानी महिला भी) तो मन में एक ही सवाल घर कर लेता है कि इनके अस्तित्व का कोई साबुत हिस्सा इनके अंदर बचा होगा क्या?

(फोटो- साभार- इंटरनेट)

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