कमरे वाला कोना

कमरे को लेकर एक अजीब तरह का आकर्षण उसे बचपन से था, बचपन में भाई-बहनों के साथ कमरा शेयर करती थी, बड़ी हुई तो मां के साथ, बाहर पढ़ने और नौकरी करने गई तो पीजी के कमरे में भी दो लड़कियों के साथ शेयर करना पड़ा, रूम लिया तो उसमें भी एक लड़की के साथ शेयर करना मजबूरी बन गई। शादी के बाद एक अनजाने पुरुष के साथ (जो पति था शायद उसका) कमरा शेयर करना पड़ा।  पर अपने कमरे की कसक जो उसके मन में थी वो बदस्तूर रही। पता नहीं क्यों, उसने अपनी इस ख्वाहिश को कभी मरने नहीं दिया। उसकी हर ख्वाहिश और सपने खत्म हो जाते थे जब कोई उस पर अपनी ख्वाहिशातों को थोपता था पर इस ख्वाहिश को उसने सबसे बचाकर रखा था, कभी किसी से नहीं बताया कि उसे एक कमरे की दरकार है। जिंदगी आपको मौका देती है, दिल से देती है अगर आप वाकई में दिल से उससे कुछ मांगे तो... जिंदगी ने उसे भी मौका दिया, सबसे अलग, एक शहर में, एक कमरे वाला उसका घर था। जिसमें वो रहती थी, अकेले... नहीं-नहीं अकेले नहीं बल्कि, अपनी बदमाशियों, अपनी रचनात्मकता, अपने सपने, अपनी अलग सोच, अपनी लाइफस्टाइल, अपनी आजादी, अपनी अल्हड़पन, अपने बिखरे स्वभाव, अपनी अधूरी ख्वाहिशों और हां अपने कमरे के साथ। दो-चार ही लोग उसके कमरे पर आते, वो ज्यादा लोगों को अपना कोना नहीं दिखाना चाहती थी, और हर कोई उसके कमरे वाली मोहब्बत को समझ भी नहीं सकता था। पर वो सब से अनजान खुश थी, आधी जिंदगी जिस ख्वाहिश के लिए तरसी थी, अब वो उसके साथ, उसका अपना कमरा, उसका अपना कोना।

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