प्रैक्टिकल वर्सेज इमोशनल

कल की फोटो-पोस्ट शानदार लिखी थी तुमने... कहां की थी
अरे वो सिविल लाइन्स के एक रेस्त्रां के बाहर वाली सड़क की थी....
अच्छी लगी न तुम्हें, लाइक्स भी मिले कई उसपर और कमेंट्स की भरमार हो गई।
हां देखा था मैंने, एक बात पूंछू, बुरा तो नहीं मानोगे
हां-हां पूछो न
कमेंट्स, पोस्ट की बात को अगर दरकिनार कर दिया जाए तो तुमने उस इंसान को देखकर सबसे पहले क्या सोचा था
सच कहूं तो यही सोचा था कि ये इंसान एक बेहतर सब्जेक्ट हो सकता है क्यों न इस पर लिखा जाए।
हम्म, उसके अलावा
उसके अलावा... इससे क्या मतलब
मतलब ये कि उसके हाथ में जो बेचने वाला सामान था उसे क्यों नहीं खरीदा, ठीक है वो तुम्हारे लिए एक बेहतरीन सब्जेक्ट था लिखने के लिए पर अगर इस सोच के अलावा तुम थोड़ा बहुत इंसानी जज्बात रखते तो कितना बेहतरीन हो जाता न। तुम्हारे पोस्ट पर लाइक्स तो मिलते ही साथ ही तुम्हें भी कुछ सुकुन हो जाता कि तुमने अपने सब्जेक्ट की मदद तो की। सोचो न तुम उसका सामान खरीदते तो उसे कितना अच्छा लगता, एक सुकून वाली मुस्कान उसके चेहरे पर भी होती और तुम्हारे मन और होंठों पर भी। शब्द तुम्हें लाइक्स दे सकते हैं पर भावनाएं तुम्हें बेहतरीन इंसान बनाती हैं।
दिमाग खराब हो गया है क्या तुम्हारा, हद इंसान हो तुम भी, भाई लिखने के लिए लिखा था मैंने, ऐसे परोपकार करने लग गया न तो हो गया मेरा बेड़ापार, बेटा प्रैक्टिकल होना भी किसी चीज को कहते हैं समझी। भावुक बातें न सोशल साइट्स के पोस्ट में ही अच्छी लगती हैं। ऐसे भावुक हो गया न तो लोग पागल समझेंगे मुझे। हद हो यार तुम भी, बुरा मत मानना तुम न पढ़ी लिखी, भावुक इंसान हो। प्रैक्टिकल बनों, नहीं तो जीना मुहाल कर देंगे लोग तुम्हार।
अच्छा छोड़ों आज एक और बेहतर सब्जेक्ट मिला है उस पर लिखूंगा, तुम पढ़कर बताना कैसा लिखा है।

हम्म...

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