कायरता नहीं...बस कोई बात करने वाला नहीं मिलता है
ड्राइंग रूम में चाय का कप लेकर ये डिस्कशन करना कि यार पागल थी लड़की जिसने सुसाइड कर लिया, अरे उस लड़के को ऐसी भी क्या फ्रस्टेशन की पंखे पर झूल गया, सोशल मीडिया पर rip लिख देना भी बहुत आसान है और ये जजमेंट पास कर देना कि कायर लोग होते हैं जो सुसाइड करते हैं... लेकिन हम कभी ये नहीं सोचते कि वो इंसान कितना टूट चूका होगा जब उसने ये फैसला किया होगा, उसके आस-पास शायद कोई नहीं होगा तभी तो वो अपनी बात कह नहीं पाया और मौत से बात करने चल दिया। ये कह देना कि सुसाइड कायरता है बहुत आसान है पर वाकई में मौत को गले लगाना इतना भी आसान नहीं। जब कोई बुरी तरह से टूट जाए, कोई ऑप्शन न बच सके, तब ये फैसला लेना भी कठिन होता है कि सारे रिश्ते को तोड़ मौत को गले लगा लें क्या। एक वाक्या याद है मुझे मेरी एक कलीग एक दिन बहुत उदास होकर आई, पूछने पर बताया कि उसके पड़ोस में एक टीनएज लड़की ने सुसाइड अटेम्प्ट कर लिया। मेरी कलीग ने उस दिन कहा कि यार मेरी गलती है, मैंने पूछा क्यों, तो बोली कि वो लड़की कई दिन से कह रही थी कि दीदी आपसे कोई जरूरी बात करनी है पर मैं अपने काम, अपनी रिपोर्टिंग में इतनी बिजी थी कि उससे बात ...