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अपनी वाली जिंदगी

लव मैरिज या अरेंज, लव, लव क्यों, वो इसलिए दूसरों की गलती पर पछताने से बेहतर है कि अपनी गलती पर पछताओ। खुद को कंसोल करना ज्यादा आसान रहता है कि अबे यार गलती हो गई, इंसान ही तो हैं। पर ऐसा लड़कियों को करने कहां दिया जाता है। सही कहा, बचपन से सब्जेक्ट से लेकर सूट की डिजाइन और किस लड़के से शादी करनी है, तक पिता और भाई की मर्जी। प्यार करना है और प्यार में शादी करनी है या नहीं ये प्रेमी महोदय डिसाइड करते हैं। शादी के बाद कब बच्चा पैदा करना है, कितना करना है, किस जेंडर का करना है ये  इनलॉज डिसाइड करते हैं। जॉब करनी है या नहीं, जॉब में किससे बात करनी है, किससे नहीं ये पति डिसाइड करते हैं। उसके बाद घर में खाना क्या बनेगा इस पर पति, सास-ससुर, बच्चे की मर्जी। अधेड़ होते-होते और लड़की से औरत बनने के सफर में हम अपना नाम, अपनी पसंद, अपनी मर्जी तक भूल जाते हैं। दूसरों का ही याद रहता है सबकुछ। और सबसे डरावनी बात ये है कि अकेले बैठकर सोचने पर भी अपना ख्याल रत्ती भर नहीं आता है बल्कि आसपास की माया में घिरी रहती हैं हम। हम अपने बारे में न सोचे इसके लिए कहा जाता है स्त्री का हृदय विशाल होता है...

उदास दोपहर

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उदास दोपहरें, उदास और अकली नहीं होती उनमें कुछ बातें होती हैं कुछ पिछला होता है कुछ पुरानी चिट्ठियां होती हैं कुछ खुद के ऊपर आया गुस्सा होता है, उदास दोपहरें, उदास और अकली नहीं होती उदास दोपहरों में भी आती है, होंठों पर मुस्कान, उदास दोपहरें ही बनती हैं डायरी की राजदार, उदास दोपहरों में ही, आई एक उबासी और फिर छोड़ी गई गहरी सांस ही, खुद के ऊपर जीने वाला लम्हा सा लगता है। उदास दोपहरों की दोस्त होती हैं उदास शामें और रात जब तीनों एक साथ होती हैं तो उदास दोपहर, वाकई में उदास और अकेली नहीं होती। दिव्या

कमरे वाला कोना

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कमरे को लेकर एक अजीब तरह का आकर्षण उसे बचपन से था, बचपन में भाई-बहनों के साथ कमरा शेयर करती थी, बड़ी हुई तो मां के साथ, बाहर पढ़ने और नौकरी करने गई तो पीजी के कमरे में भी दो लड़कियों के साथ शेयर करना पड़ा, रूम लिया तो उसमें भी एक लड़की के साथ शेयर करना मजबूरी बन गई। शादी के बाद एक अनजाने पुरुष के साथ (जो पति था शायद उसका) कमरा शेयर करना पड़ा।  पर अपने कमरे की कसक जो उसके मन में थी वो बदस्तूर रही। पता नहीं क्यों, उसने अपनी इस ख्वाहिश को कभी मरने नहीं दिया। उसकी हर ख्वाहिश और सपने खत्म हो जाते थे जब कोई उस पर अपनी ख्वाहिशातों को थोपता था पर इस ख्वाहिश को उसने सबसे बचाकर रखा था, कभी किसी से नहीं बताया कि उसे एक कमरे की दरकार है। जिंदगी आपको मौका देती है, दिल से देती है अगर आप वाकई में दिल से उससे कुछ मांगे तो... जिंदगी ने उसे भी मौका दिया, सबसे अलग, एक शहर में, एक कमरे वाला उसका घर था। जिसमें वो रहती थी, अकेले... नहीं-नहीं अकेले नहीं बल्कि, अपनी बदमाशियों, अपनी रचनात्मकता, अपने सपने, अपनी अलग सोच, अपनी लाइफस्टाइल, अपनी आजादी, अपनी अल्हड़पन, अपने बिखरे स्वभाव, अपनी अधूरी ख्वाहिशों औ...

मैं अस्थिर हूं...

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मैं स्त्री हूं, इसलिए मैं अस्थिर हूं, स्थिर होती तो नहीं जी पाती दो जिंदगियां मैं अस्थिर हूं, तभी शायद जिंदा हूं, दोनों समाज में एक समाज जो है मेरा खुद का दूजा जो दूसरों ने बनाया। अस्थिर हूं इसलिए बन पाती हूं मां खुद को भी संभालती हूं मां के जैसे, और अपने पुरुष के दिए जीवन को भी। अस्थिर हूं, क्योंकि नदी हूं खुद के बहाव को अपने अंदर के पानी को चट्टानों के अनुरूप देती हूं मोड़ मेरा अस्थिर होना ही, शायद  चट्टान को चिकना कर देता है क्योंकि मेरे पानी ने उसका झेला है नुकीलापन, तब कहीं जाकर कर पाई हूं उसे अपने अनुरूप अस्थिर हूं, तभी तो बना पाई मन को बावरा, जो ठहरता ही नहीं कहीं। अस्थिर हूं, इसलिए किसी एक भाव पर टिकती नहीं हूं, हर भाव को समरूप जीती हूं। अस्थिर हूं, तभी शायद मौका मिलते ही अपने अस्तित्व का छाप छोड़ देती हूं किसी के मन में, स्थिर होती तो शायद गुम हो जाती, टूट जाती या फिर जाती बिखर खुश हूं कि अस्थिर हूं, खुश हूं कि स्त्री हूं दिव्या

नया स्टेप, जिंदगी वाला...

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मोबाइल ने एक परसेंट बैटरी बताई फिर टू टू करते हुए खुद को बंद कर लिया, रमा ने वोदका का अभी दूसरा सिप ही लिया था। बहुत बेमन से उसने मोबाइल देखा और फिर से वोदका पीने लगी। कॉलेज टाइम से उसे वोदका पीने का बहुत मन करता था, कि आखिर इसका स्वाद होता कैसा है। मौका मिला 15 साल बाद वो भी आज के दिन। एक नई शुरूआत वाले दिन। शुरुआत तो साल भर पहले ही हो गई थी बस आज एक तरह से सत्यनारायण की पूजा हुई है जैसे। पिछले साल की ही तो बात है सिंतबर का महीना था (रमा के दो सबसे प्यारे महीने हैं सितंबर और अक्टूबर, उस दौरान जो हवाओं में सिहरन, धूप में गुनगुनापन होता है न उसे महसूस करते हुए वो खुद को यश चोपड़ा की हीरोइन से कम कभी नहीं समझती थी) और गणपति विसर्जन का दिन था, ढोल की आवाज़ उसके कानों में पड़ रही थी, लाख कोशिश करने के बावजूद भी वो अपने पैरों को थिरकने से रोक नहीं पा रही थी। अचानक से पता नहीं उसके मन में क्या आया कि प्रसाद का बहाना करके बिल्डिंग से उतर नीचे सोसाइटी के ग्राउंड में आ गई और देखते-देखते क्या झूम के नाची की हर किसी आंखें अपनी साइज से दोगुनी तो हो ही गई थीं। खैर पसीने से लथपथ जब वो फ्लैट का दरव...

अस्तित्व विसर्जन

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जब भी गणपति विसर्जन या दुर्गा विसर्जन देखती हूं तो अक्सर ये लगता है कि हम लड़कियां भी शादी के बाद विसर्जित ही की जाती हैं, पानी की जगह होता है नए घर का वातावरण। हमें पूर्ण रूप से अपने अस्तित्व को उसमें मिला देना होता है। हम जो मां के गर्भ से लेकर अब तक जैसे भी रही हैं हमें खुद को मिटाना। एक आर्दश स्त्री (जिसमें स्त्री के सारे रूप आते हैं) वाली अवधारणा को पूरा करने के लिए सम्पूर्ण रूप से खुद को उस पानी में घोल देना होता है जिसे हमारे परिवार वालों ने या कई बार बाई डिफाल्ट हमने  खुद चुना होता है। बचपन से बड़े होने तक हमें दूसरे परिवार के अनुरूप जीवन जीने के लिए गढ़ा जाता है एक मिशन के तौर पर ताकि परिवार वालों पर ये आरोप न लगे कि आपकी बिटिया तो हमारे पानी में घुल ही नहीं पाई, कुछ न कुछ तो साबुत रह ही गया। कई बार अजीब लगता है कि हमें हमारी जिंदगी के लिए नहीं गढ़ा जाता है बल्कि दूसरे परिवार और उस आने वाले लड़के के लिए गढ़ा जाता है। ये तैयारियां बचपन से चलती हैं। ऐसी ही कोई तैयारी लड़का करता है क्या? क्या उसके मां-पिता उसके जीवन में आने वाली भावी लड़की के लिए उसे तैयार करते हैं? कि उसे क...

प्रैक्टिकल वर्सेज इमोशनल

कल की फोटो-पोस्ट शानदार लिखी थी तुमने... कहां की थी अरे वो सिविल लाइन्स के एक रेस्त्रां के बाहर वाली सड़क की थी.... अच्छी लगी न तुम्हें, लाइक्स भी मिले कई उसपर और कमेंट्स की भरमार हो गई। हां देखा था मैंने, एक बात पूंछू, बुरा तो नहीं मानोगे हां-हां पूछो न कमेंट्स, पोस्ट की बात को अगर दरकिनार कर दिया जाए तो तुमने उस इंसान को देखकर सबसे पहले क्या सोचा था सच कहूं तो यही सोचा था कि ये इंसान एक बेहतर सब्जेक्ट हो सकता है क्यों न इस पर लिखा जाए। हम्म, उसके अलावा उसके अलावा... इससे क्या मतलब मतलब ये कि उसके हाथ में जो बेचने वाला सामान था उसे क्यों नहीं खरीदा, ठीक है वो तुम्हारे लिए एक बेहतरीन सब्जेक्ट था लिखने के लिए पर अगर इस सोच के अलावा तुम थोड़ा बहुत इंसानी जज्बात रखते तो कितना बेहतरीन हो जाता न। तुम्हारे पोस्ट पर लाइक्स तो मिलते ही साथ ही तुम्हें भी कुछ सुकुन हो जाता कि तुमने अपने सब्जेक्ट की मदद तो की। सोचो न तुम उसका सामान खरीदते तो उसे कितना अच्छा लगता, एक सुकून वाली मुस्कान उसके चेहरे पर भी होती और तुम्हारे मन और होंठों पर भी। शब्द तुम्हें लाइक्स दे सकते हैं पर भावन...

अछूत कन्या

अरे, अरे, फिर सामने पड़ गई, हटो सामने से, तुम्हें मना किया है न कि महीने के उन दिनों में तुम पूजा के लिए जाते वक्त मेरे सामने न पड़ा करो। तो मैं कहां आपके सामने आ गई, आप ही आई हैं मेरे सामने अरे राम रे लड़की तुलसी के पौधे से सटकर क्यों खड़ी है, तुलसी मुरझा जाएंगी... मना किया है न कि उन दिनों में तुलसी के पौधे को नहीं छूते। हद है, क्यों नहीं छूते... मैं तो हर वक्त इन्हें पानी देती हूं, समझीं, क्या ये मुरझाईं और एक बात ये पौधे हैं, इन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि मेरे शरीर में क्या बदलाव हो रहा है, बस इन्हें एक चीज से फर्क पड़ता है कि मेरा स्वभाव न बदले, ये प्यार करते हैं मुझे और मैं इनसे। अच्छा एक बात कहूं मां, मां पूजा का काम करते हुए बोली, हां बोलो... अच्छा नानी भी आपके साथ ऐसा व्यवहार करती थीं जैसा आप मेरे साथ करती हैं ? हां, जब तुम्हारी उम्र की थी न मैं , तो नानी भी यही सब करती थीं मेरे साथ तब आपको कैसा महसूस होता था ? वैसा ही महसूस होता था, जैसा अब तुम्हें हो रहा है, बहुत गुस्सा आता था... तो आपने कोई विरोध क्यों नहीं किया ? मां कुछ खोए हुए अंदाज में बोलते हुए,...