अपनी वाली जिंदगी
लव मैरिज या अरेंज, लव, लव क्यों, वो इसलिए दूसरों की गलती पर पछताने से बेहतर है कि अपनी गलती पर पछताओ। खुद को कंसोल करना ज्यादा आसान रहता है कि अबे यार गलती हो गई, इंसान ही तो हैं। पर ऐसा लड़कियों को करने कहां दिया जाता है। सही कहा, बचपन से सब्जेक्ट से लेकर सूट की डिजाइन और किस लड़के से शादी करनी है, तक पिता और भाई की मर्जी। प्यार करना है और प्यार में शादी करनी है या नहीं ये प्रेमी महोदय डिसाइड करते हैं। शादी के बाद कब बच्चा पैदा करना है, कितना करना है, किस जेंडर का करना है ये इनलॉज डिसाइड करते हैं। जॉब करनी है या नहीं, जॉब में किससे बात करनी है, किससे नहीं ये पति डिसाइड करते हैं। उसके बाद घर में खाना क्या बनेगा इस पर पति, सास-ससुर, बच्चे की मर्जी। अधेड़ होते-होते और लड़की से औरत बनने के सफर में हम अपना नाम, अपनी पसंद, अपनी मर्जी तक भूल जाते हैं। दूसरों का ही याद रहता है सबकुछ। और सबसे डरावनी बात ये है कि अकेले बैठकर सोचने पर भी अपना ख्याल रत्ती भर नहीं आता है बल्कि आसपास की माया में घिरी रहती हैं हम। हम अपने बारे में न सोचे इसके लिए कहा जाता है स्त्री का हृदय विशाल होता है...