उदास दोपहर
उदास दोपहरें, उदास
और अकली नहीं होती
उनमें कुछ बातें
होती हैं
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कुछ पिछला होता है
कुछ पुरानी
चिट्ठियां होती हैं
कुछ खुद के ऊपर आया
गुस्सा होता है,
उदास दोपहरें, उदास
और अकली नहीं होती
उदास दोपहरों में भी
आती है, होंठों पर
मुस्कान,
उदास दोपहरें ही
बनती हैं
डायरी की राजदार,
उदास दोपहरों में
ही,
आई एक उबासी और
फिर छोड़ी गई गहरी
सांस ही,
खुद के ऊपर जीने
वाला
लम्हा सा लगता है।
उदास दोपहरों की
दोस्त होती हैं
उदास शामें और रात
जब तीनों एक साथ
होती हैं
तो उदास दोपहर,
वाकई में उदास और
अकेली नहीं होती।

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