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भूलना इतना आसां होता है क्या ?

भूलना इतना आसां होता है क्या ? जिंदगी में कुछ परिस्थितयां, कुछ लोग, कुछ बातें और बहुत कुछ... इन सभी चीजों को हम बस भूलना चाहते हैं। यादों की किताबों से ये पन्ने हमेशा-हमेशा के लिए हटाना चाहते हैं। पर क्या वाकई में ऐसा कुछ कर पाते हैं हम सभी। ईमानदारी से अगर कहें तो नहीं। हम भूलने का नाटक जरूर औरों के सामने कर सकते हैं पर दिल और दिमाग के फिल्म में उन भूलने वाली चीजों की रील चलती रहती है, वो भी बिना किसी पॉज बटन के। कुछ बेहद निजी लम्हों में इन्हीं भूल जाने वाले पलों में हम खोए होते हैं। चाहें यादें अच्छी हों या बुरी, लोग अच्छे हों या बुरे पर ये सारी चीजें उन लम्हातों में होते हैं जिसके हिस्से हम भी थे। और खुद के हिस्से को खुद से यूं अलग करना इतना आसान नहीं होता है। इसलिए खुद के बनाएं कैदखाने में खुद के ही कुछ हिस्से हम सभी कैद कर लेते हैं, और यूं दिखाते हैं कि देखो हम तो भूल गए... हमें कुछ भी तो याद नहीं। कितने बेहतरीन अदाकारी करते हैं हम, भूलने के नाम पर। अक्सर लोग कहते हैं कि हमें अभिनय नहीं आता पर अगर सच बात कहूं तो हर इंसान एक बेहतरीन अदाकार होता है जो अपनी अदाकारी से अपने आसप...

हर जगह है... पॉलिटिक्स

हर जगह है... पॉलिटिक्स कभी भी पॉलिटिक्स में इंट्रस्ट नहीं रहा मेरा, कौन से राज्य में कब चुनाव है, किसकी सरकार है, किसने कितनी सीट्स जीती, इन सारी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी। हां जितना कोर्स और एग्जाम के लिए सही लगता उतना नॉलेज भर रखती थी। पर पॉलिटिक्स को लेकर मेरा नजरिया बदला कॉलेज के पहले दिन होने वाले ओरिएंटेशन लेक्चर ने। मॉस कॉम में एडमिशन लिया था। कॉलेज का पहला दिन और पहला ओरिएंटेशन लेक्चर, टॉपिक था W hy Politics Matter  और इस टॉपिक पर व्याख्यान दे रहे थे प्रो योगेंद्र यादव। पॉलिटिक्स पर बात करते हुए उन्होंने एक बात कही जो उस पूरे लेक्चर में मुझे सबसे ज्यादा हिट की वो ये कि "आपको क्या लगता है कि पॉलिटिक्स सिर्फ सरकार और राजनीतिक दल ही करते हैं, नहीं पॉलिटिक्स हम और आप भी करते हैं। हम और आप अपनी जिंदगी से राजनीति को कभी हटा नहीं सकते।" उनकी ये बात दिल को वाकई लगी। वाकई में हम सब अपने हर रिश्ते में कही न कहीं पॉलिटिक्स का ही तो सहारा लेते हैं। रिश्ते की जोड़तोड़ क्या किसी सरकार की जोड़-तोड़ से कम होती है। जाने-अनजाने मैं भी तो अपने रिश्तों में कही न कहीं पॉलि...