भूलना इतना आसां होता है क्या ?
भूलना इतना आसां होता है क्या ?
जिंदगी में कुछ
परिस्थितयां, कुछ लोग, कुछ बातें और बहुत कुछ... इन सभी चीजों को हम बस भूलना
चाहते हैं। यादों की किताबों से ये पन्ने हमेशा-हमेशा के लिए हटाना चाहते हैं। पर
क्या वाकई में ऐसा कुछ कर पाते हैं हम सभी। ईमानदारी से अगर कहें तो नहीं। हम
भूलने का नाटक जरूर औरों के सामने कर सकते हैं पर दिल और दिमाग के फिल्म में उन
भूलने वाली चीजों की रील चलती रहती है, वो भी बिना किसी पॉज बटन के। कुछ बेहद निजी
लम्हों में इन्हीं भूल जाने वाले पलों में हम खोए होते हैं। चाहें यादें अच्छी हों
या बुरी, लोग अच्छे हों या बुरे पर ये सारी चीजें उन लम्हातों में होते हैं जिसके
हिस्से हम भी थे। और खुद के हिस्से को खुद से यूं अलग करना इतना आसान नहीं होता
है। इसलिए खुद के बनाएं कैदखाने में खुद के ही कुछ हिस्से हम सभी कैद कर लेते हैं, और
यूं दिखाते हैं कि देखो हम तो भूल गए... हमें कुछ भी तो याद नहीं। कितने बेहतरीन अदाकारी
करते हैं हम, भूलने के नाम पर। अक्सर लोग कहते हैं कि हमें अभिनय नहीं आता पर अगर
सच बात कहूं तो हर इंसान एक बेहतरीन अदाकार होता है जो अपनी अदाकारी से अपने आसपास
के लोगों से हर उस लम्हात को छुपा ले जाता है जिसे उसे भूलना होता है, पर कोशिश
करके भी भूल नहीं पाता।
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