हर जगह है... पॉलिटिक्स

हर जगह है... पॉलिटिक्स

कभी भी पॉलिटिक्स में इंट्रस्ट नहीं रहा मेरा, कौन से राज्य में कब चुनाव है, किसकी सरकार है, किसने कितनी सीट्स जीती, इन सारी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी। हां जितना कोर्स और एग्जाम के लिए सही लगता उतना नॉलेज भर रखती थी। पर पॉलिटिक्स को लेकर मेरा नजरिया बदला कॉलेज के पहले दिन होने वाले ओरिएंटेशन लेक्चर ने। मॉस कॉम में एडमिशन लिया था। कॉलेज का पहला दिन और पहला ओरिएंटेशन लेक्चर, टॉपिक था Why Politics Matter  और इस टॉपिक पर व्याख्यान दे रहे थे प्रो योगेंद्र यादव। पॉलिटिक्स पर बात करते हुए उन्होंने एक बात कही जो उस पूरे लेक्चर में मुझे सबसे ज्यादा हिट की वो ये कि "आपको क्या लगता है कि पॉलिटिक्स सिर्फ सरकार और राजनीतिक दल ही करते हैं, नहीं पॉलिटिक्स हम और आप भी करते हैं। हम और आप अपनी जिंदगी से राजनीति को कभी हटा नहीं सकते।" उनकी ये बात दिल को वाकई लगी। वाकई में हम सब अपने हर रिश्ते में कही न कहीं पॉलिटिक्स का ही तो सहारा लेते हैं। रिश्ते की जोड़तोड़ क्या किसी सरकार की जोड़-तोड़ से कम होती है। जाने-अनजाने मैं भी तो अपने रिश्तों में कही न कहीं पॉलिटिक्स करती थी, मैं क्या शायद हर कोई, हम सभी। क्योंकि रिश्तों की सरकार में हर किसी को अपनी सीट जो बचानी होती है।  उस एक वाक्य ने रिश्ते और पॉलिटिक्स को लेकर बहुत हद तक मेरा नजरिया क्लीयर किया। अब देश की पॉलिटिक्स से उतनी नफरत नहीं होती, रूचि थोड़ी बढ़ी पर हां उस पर बात करने पर आज भी कतराती ही हूं।  रही रिश्तों की पॉलिटिक्स तो न चाहते हुए भी कहीं न कहीं उनका हिस्सा बन जाती हूं या बना दी जाती हूं।


एक लड़की के नोट्स 

टिप्पणियाँ

  1. दिव्या आपका अभिनंदन, कम से कम जी खोल कर अभिव्यक्त करने वाला मंच चुना है आपने। हां, रिश्तों को संभालने और उनको तोड़ने के लिए राजनीति जाने-अंजाने में ही होती है, कुछ तो ये कला बड़ी गणना के साथ आजमाते आए हैं। राजशाही और एकता के धारावाहिक तो इनकी बानगी हैं। कई बार राजनीति दाव लगाने जैसी खुशी देने लगती है तब ये नशे की मानिंद आपको स्वयंभू बनाने की दिशा में कुछ इस कदर धकेल देती है, जहां आप कईयों के साथ रपटने का आनंद लेने लगते है। कुछ लोगों के लिए यह उनके आसपास के परिवेश तथा उसके घटकों को व्यवस्थित करने का मात्र अभ्यासभर होती है, आप चाहो तो इसे अस्तित्व में रहने के लिए मदद देने वाला औजार भी मान सकती हैं। पर अस्तित्व की चरम लड़ाई में कोई कायदे या नियम नहीं माने जाते, वहां राजनीति सरीखा हथियार भी किसी दायरे या सिद्धांत में नहीं बंधता। खासतौर से जर, जमीन और जोरू के मामलों में सक्रिय तथा प्रत्यक्ष राजनीति देखने को मिलती है। यह तब शुद्ध रहने के बजाए लोलुपता के रंग में रंग जाती है और कई बेकसूरों की जिंदगी उजाड़ने का कसूरवार बनती है।

    जवाब देंहटाएं
  2. सोमाद्री जी मेरे लेख को आपने और ज्यादा तर्कपूर्ण और सार्थक कर दिया है अपनी टिप्पणी से जो चीजे मुझसे रह गई उन्हें आपने बखूबी बयां कर दिया। ब्लॉग पढ़ने का शुक्रिया।

    जवाब देंहटाएं
  3. निसन्देह हम चाह कर भी इस राजनीति से दुर नहीं हो पाते, इसलिए मेरा मानना रहा है कि जब हिस्सा बनना ही है तो क्यों नाजम कर राजनीति कर लीजाय...अच्छा लगा आपकी लेखनी मे शिवानी की झलक है ळिखते रहिये शुभकामना...

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुछ नाटकों का पर्दा कभी नहीं गिरता

उसका यूं जाना...

चिनाब सी लड़की...