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अगस्त, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अपने हिस्से के रिश्ते.......

नैना तुम अरेंज मैरिज कर रही हो.... भड़ाक से दरवाजा खोलते हुए सारिन्धा का ये पहला सवाल था। ओह्ह हो तो सारिन्धा मोहरतमा आखिरकार अपने बिजी शेड्यूल से वक्त निकालकर हमारी शादी में तशरीफ ले ही आईं। वेट...ये बकवास छोड़ो, जो पूछा है वो बताओ। तुम वाकई में शादी कर रही हो... आई मीन वो तुम्हारा पागलपन वाला प्यार, वो रिश्ता वो क्या हुआ नैना, ये अरेंज मैरिज वो भी तुम.... नैना हंसते हुए- तो क्या नहीं कर सकती मैं, बोलो, कोई अजूबा तो नहीं कर रही न मैं। नैना प्लीज अपनी बकवास बंद करो जो पूछा है उसका जवाब दो... जी हां आपने सही सुना है मोहतरमा मैं पूरे होशो हवास में अरेंज मैरिज... जी हां अरेंज मैरिज कर रही हूं... आई नो तुम शॉक हो.... पर देखो प्रैक्टिकल हो के सुनों जो मैं कहने जा रही हूं... देखो वो सिर्फ और सिर्फ प्रेमी था, जिसने मुझसे प्रेम किया, उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी की और चला गया, बाकी जो बचा हुआ हिस्सा था न जिसमें शादी, फैमिली प्लानिंग, बच्चे, होम लोन, ई एम आई, रिश्तेदारी की झझंट, घर का हो हल्ला, शादीशुदा जिंदगी की अपनी मशक्कत, पति-पत्नी की खटपट आदि की जिम्मेदारी वो मेरे होने वाले पति मह...

एक‬ कहानी ख्वाहिश की...

निवेदिता कहां है आजकल? वो, दमन और दीऊ में अपनी यात्रा के मजे ले रही है। कितनी बेहतरीन जिंदगी जी रही है वो... पैरों में स्पोर्ट्स शूज, पीठ पर एक बैग, गले में एक शानदार कैमरा और पॉकेट और डेबिट कार्ड में पैसे। जिंदगी में और क्या चाहिए। कई बार अपनी बेटी की ये जिंदगी देखकर सोचती हूं जिंदगी में ज्यादा चीजों की दरकार दरअसल इतनी होती नहीं है जितनी हम शो करते हैं। बात तो तुमने सही कही है, निवेदिता का सपना रहा होगा न ये... सच कहूं तो ये सपना मेरा था, जब वो गर्भ में थी न मेरे तो रोज अप ने इसी सपने को अकेले में बैठ उससे साझा करती थी। मुझे वाकई नहीं पता था कि बड़े होने पर मेरा वही सपना वो जीएगी। पता है जब पहली बार वो निकली थी न यूं घूमने तो पता है उसने मुझसे कहा था कि मां आपका सपना जीने जा रही हूं वो भी अपनी आंखों से...पता है मां अक्सर मां-बाप अपने सपने बच्चे पर थोपते हैं कि फलां बनों, पैसे कमाओ, रूतबा बनाओ, पर आपने तो सपने में मुझे जिंदगी दे दी वो जिंदगी जो सिर्फ मेरी है, इसलिए आपके सपने को मैंने अपनी जिंदगी मान ली। अब जब कहीं भी जाती है तो फोनकर पता है क्या कहती है कि मां जिस भी जगह जाती हूं...

कुछ‬ लिखा, खोया हुआ सा...

तुम लेखक भी अजीब होते हो... क्यों ? अरे, तुम लोगों को कहीं कोई कागज का टुकड़ा दिखा नहीं कि लिख देते हो अपने दिल की बात। वो हंसते हुए... अच्छा तो ये बात है। वैसे तुमने ये बात तो सही कही है, इसी आदत के चलते देखो पूरे दो घंटे से परेशान हो रही हूं। क्यों भला?  अरे कोई पीस लिखा था किसी कागज पर अब ढूंढ रही हूं कि रखा कहां है... तुम्हें कोई कागज मिला है क्या जो तुम वो बात कह रहे थे अभी। हां मिला है न... तब भी तो कह रहा था कि तुम लोग कागज देखते ही अपनी दिल की बात लिख देते हो। अच्छा ये बाताओ लिखा क्या है? अरे चुप क्यों बताओ न क्या पता मेरा खोया हुआ वही पीस हो, जिसे ढूंढ रही हूं इतनी देर से। हां सही कहा खोया हुआ है.... बोलो भी क्या लिखा है उसपर मैंने वो......शांतनु के बारे में लिखा है.... वो चुप हो जाती है, थोड़ी देर बाद बोलती है, कुछ खोए हुए लोग आपको कागज में ही मिलते हैं। वो तब भी खामोश रहता है। पता है मैं अपना लिखा सहेज कर क्यों नहीं रखती, इधर-उधर क्यों किसी कागज पर लिख देती हूं, इसलिए क्योंकि तुम उन सारे लिखे हुए को संभाल लेते हो जिस तरह मुझे संभाले हुए हो न जाने कितने सालों से। ...