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अगस्त, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पीठ पर

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वो बहुत आगे बढ़ चुका था ऐसा वो खुद सोचता था उसे लगा उसके आगे बढ़ जाने से जिंदगी की बीती हुई चीजें भी पीछे छूट जाएंगी पर उसे नहीं पता था कि वो अपनी पीठ पर अपनी पुरानी जिंदगी को ढो रहा था पीठ पर कभी जो उसकी मोहब्बत ने उसकी और अपनी कहानी लिखी थी वो कभी उसे मिटा नहीं पाया क्योंकि वो अपनी पीठ नहीं देखता था वो बस आगे बढ़ रहा था और उसकी पीठ पर उसकी पूरानी जिंदगी एक बेताल की तरह उससे चिपकी हुई बैठी थी वो जितना आगे बढ़ता जिंदगी में पुरानी बातें और यादें भी उतना ही आगे बढ़ जाती उसी की ही जिंदगी में पीछे छुटी हुई चीजें अक्सर अक्सर पीछे पीठ पर चिपक के रह जाती हैं...

भाषाएं

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सबसे ज्यादा डर किसका लगता है तुम्हें भाषाओं को न जानने का सुनो और देखो तो सही कितनी तो भाषाएं आसपास हैं फैली पर मुझे तो बस एक ही भाषा आती है कभी-कभी डर लगता है कोई भाषा न जानने से किसी रिश्ते को तो नहीं खो दूंगी। जवाब के बदले में वो मुस्कुराता है बस तुम मुस्कुराए क्यों तुम्हें आती  तो हैं कई भाषाएं तो क्यों कहती हो कि नहीं  आती मुझे कोई भाषा मेरे होंठों ने हल्के से क्या कहा वो जान तो गई हो तुम... पता है मुझे कई सारी भाषाएं आती हैं फिर भी मैं डरता हूं क्यों क्योंकि मुझे भी तुम्हारी तरह भाषा का डर है कई बार लगता है कि तुम यूं ही कभी अपनी आंखों से एक अलग भाषा में कुछ कहोगी तो क्या समझ पाऊंगा मैं तुम्हारी अंगुली के पोरों की वो जो भाषा है कहीं उसका अहसास भूल गया तो पैरों के अंगूंठों से गिली मिट्टी पर जो तुम बस रेखाएं बनाती हो उनके अक्षर नहीं समझ पाया तो तुम अकेली कितनी सारी भाषाएं तो बोलती हो कहीं किसी दिन उनमें से कोई एक भूल गया तो क्या तुम हमारे रिश्ते की भाषाई व्याकरण के समीकरण को अकेले हल कर पाओगी न फिर खुद ही खु...