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प्रेम की विरासत...

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   इंसान की एक खूबी है कि वो अभिनय कमाल का करता है। इंसान अक्सर दूसरों के सामने ये अभिनय करता है कि वो अपने प्रेम को भूल चुका है, पर ये सिर्फ वही जानता है कि प्रेम की एक कड़ी को वो हर वक़्त थामे चलता है। वो कड़ी कुछ भी हो सकती है कोई किताब, कोई जगह, कोई शख्स, कोई शहर या एक न मिटने वाली प्यास...। अक्सर एक स्त्री जब अधूरा प्रेम लेकर अपनी ज़िन्दगी जीती है तो उस प्रेम को अपने मन में ज़िंदा रखने के लिए, वो प्यास भी अपने अंदर ज़िंदा रखती है, जो विवाह भर से खत्म नहीं होता। लेकिन अनजाने में वो यह भूल जाती है कि जो प्यास उसने अपने प्रेम को याद रखने के लिए बतौर कड़ी अपने अंदर ज़िंदा रखी होती है, वही प्यास चुपके से उसके उस बच्चे के अंदर भी चली जाती है जो विवाह की निशानी है। वही बच्चा या बच्ची जब बड़ी होती है तो प्रेम की वही प्यास उसे बेकल किये होती है, उसे लगता है वो उसकी प्यास है पर वो तो उसकी मां से विरासत में उसे मिला होता है। कई बार कड़ी का ये सिलसिला अनवरत, अदृश्य चलता रहता है...और कई बार कड़ी एक मिल चुके, जिये जा चुके प्रेम पर आ खत्म भी हो जाती है। ज़रूरी नहीं कि विरासत में हमें मां-बाप से ज़म...