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लम्हा और साल

एक और साल बीत गया नहीं बीता तो वो लम्हा जो हमने साथ जीया था, पता है लम्हे और साल में, बहुत फर्क होता है साल बीतते जाते हैं पर लम्हा यूं ही रहता है जस का तस, जड़ सा साल का रिश्ता कैलेंडर से होता है और लम्हे का दिल से। यूं तो साल के अंदर ही होता है लम्हा कैद पर साल हमें छोड़ आगे बढ़ जाता है, पर लम्हा, हम में ही कहीं ठहर सा जाता है। हर एक सांस की तरह ही लम्हे को हम जीते हैं पर साल को तो नहीं जीते हैं न उसे तो शायद बिताते हैं साल में लम्हा कैद है पर उससे अलग भी है, जिस तरह तुम मुझमें कैद हो और आजाद भी। दिव्या