मैट्रो का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में कोलकाता मुंबई जैसे शहरों का ख्याल आता है ,लेकिन यहा मैट्रो से मेरा मतलब मैट्रो ट्रेन है. मेट्रो आज दिल्ली की जान बन गयी हैं .मैट्रो के बिना आज दिल्ली की कल्पना करना ही बेकार है. मैट्रो से मेरा सामना तब हुआ जब मेरा एडमिशन भारतीय जनसंचार संस्थान में हुआ .चूँकि मेरा घर पूर्वी दिल्ली में था और मेरा संस्थान दक्षिणी दिल्ली में था. इसलिए सबसे आसान तरीका मेरे लिए संस्थान पहुंचने का था मैट्रो. पहले-पहल मैट्रो मे बड़ा बोर लगा. चौदह स्टेशन बैठे-बैठे जाना वाकई बड़ा बेकार लगता था, एक दिन देखा कुछ लड़कियां किताबे पढ़ रही थी.दिमाग ने कहा ये अच्छी चीज़ है क्यों न मै भी अपनी उन किताबो को पढ़ु जिन्हें भविष्य में पढ़नें कि योजना मै बना रही थी. दूसरे दिन मै भी एक किताब ले आयी. पहली किताब जो मैनें मैट्रो में पढ़ी वो थी फणीश्वर नाथ रेणु कि मैला आंचल.उसके बाद प्रेमचन्द्र कि गोदान,आशापूर्णा देवी कि बकुल कथा,बिमल मित्र कि एक और युधिष्टिर.शिवानी कि कालिन्दी,धर्मवीर भारती की कहानी संग्रह बन्द गली का आखिरी मकान.ये वो उपन्यास थे जि...