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सिंदूरी रिश्ता

शादी के बाद पहली सुबह थी अविरल उनींदी में मीमांसा को देख रहा था, वो छोटी सी डिबिया लिए उसके पास बेड पर बैठी थी। अविरल ने डिबिया देखी और मुस्कुराते हुए मीमांसा को देखा। कल रात ही मीमांसा ने उससे एक वादा लिया था कि हर रोज अविरल ही मीमांसा को सिंदुर लगाएगा। तो अब वादा निभाने की बारी थी। अविरल ने मुस्कुराते हुए मीमांसा के गीले बालों को छुआ फिर डिबिया से चुटकी भर सिंदुर लेकर उसकी मांग में भर दिया। दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए। अविरल का रोज मीमांसा को सिंदूर लगाना अब तो उसकी आदत सा बन गया था। आज मीमांसा ने अविरल को नहीं उठाया बल्कि वो आज अपने आप उठ गया। उसने देखा कि नहा कर मीमांसा सीधे उसके पास न आकर मम्मी के कमरे में गई। जब वो भी उसके पीछे-पीछे मम्मी के कमरे में गया तो देखा मीमांसा तेल लेकर मां के पैरों की मालिश कर रही है। पूछने पर की मां को क्या हुआ मीमांस ने बोला की आज छत से उतरे हुए मां के पैर में भयंकर मोच आ गई, जिसकी वजह से वो उनसे चला भी नहीं जा रहा था। मां ने सोचा कि हम सो रहे होंगे इसलिए आवाज भी नहीं दी, जब मैं सुबह उठकर बाहर गई थी तब देखा कि सीढ़ी पर बैठकर मां पैरों को सह...

पीठ पर

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वो बहुत आगे बढ़ चुका था ऐसा वो खुद सोचता था उसे लगा उसके आगे बढ़ जाने से जिंदगी की बीती हुई चीजें भी पीछे छूट जाएंगी पर उसे नहीं पता था कि वो अपनी पीठ पर अपनी पुरानी जिंदगी को ढो रहा था पीठ पर कभी जो उसकी मोहब्बत ने उसकी और अपनी कहानी लिखी थी वो कभी उसे मिटा नहीं पाया क्योंकि वो अपनी पीठ नहीं देखता था वो बस आगे बढ़ रहा था और उसकी पीठ पर उसकी पूरानी जिंदगी एक बेताल की तरह उससे चिपकी हुई बैठी थी वो जितना आगे बढ़ता जिंदगी में पुरानी बातें और यादें भी उतना ही आगे बढ़ जाती उसी की ही जिंदगी में पीछे छुटी हुई चीजें अक्सर अक्सर पीछे पीठ पर चिपक के रह जाती हैं...

भाषाएं

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सबसे ज्यादा डर किसका लगता है तुम्हें भाषाओं को न जानने का सुनो और देखो तो सही कितनी तो भाषाएं आसपास हैं फैली पर मुझे तो बस एक ही भाषा आती है कभी-कभी डर लगता है कोई भाषा न जानने से किसी रिश्ते को तो नहीं खो दूंगी। जवाब के बदले में वो मुस्कुराता है बस तुम मुस्कुराए क्यों तुम्हें आती  तो हैं कई भाषाएं तो क्यों कहती हो कि नहीं  आती मुझे कोई भाषा मेरे होंठों ने हल्के से क्या कहा वो जान तो गई हो तुम... पता है मुझे कई सारी भाषाएं आती हैं फिर भी मैं डरता हूं क्यों क्योंकि मुझे भी तुम्हारी तरह भाषा का डर है कई बार लगता है कि तुम यूं ही कभी अपनी आंखों से एक अलग भाषा में कुछ कहोगी तो क्या समझ पाऊंगा मैं तुम्हारी अंगुली के पोरों की वो जो भाषा है कहीं उसका अहसास भूल गया तो पैरों के अंगूंठों से गिली मिट्टी पर जो तुम बस रेखाएं बनाती हो उनके अक्षर नहीं समझ पाया तो तुम अकेली कितनी सारी भाषाएं तो बोलती हो कहीं किसी दिन उनमें से कोई एक भूल गया तो क्या तुम हमारे रिश्ते की भाषाई व्याकरण के समीकरण को अकेले हल कर पाओगी न फिर खुद ही खु...

वक्त नहीं मिला...

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पता है वक्त कहीं नहीं मिलता बहुत खोजा पर वक्त है जो नहीं मिलता आजकल मिला था एक बार जब तुमने पहली बार अचानक से हाथ थामा था मेरा और मैंने हाथ छुड़ाने का नाटक किया था उस दौरान वक्त ने भी ठहर कर हम दोनों को देखा था तब मिला था जब तुम जिंदगी के सफर में अकेले चल दिए थे उस दौरान अकेलेपन को बांटने के लिए वक्त था मेरे साथ कई दफा जब अकेलेपन से चिढ़ जाती हूं ना तब वक्त होता था मुझे बहलाने के लिए वक्त ने समझाया था एक बार यूं ही कि कभी खुद को भी तो तुम समझा करो, कभी खुद पर भी मुझे बर्बाद किया करो हमेशा क्या मुझे लेकर किसी का इंतेजार करती हो मैं सिर्फ तुम्हारे लिए आता हूं ताकि दो पल तुम मेरे साथ रहा करो तब वक्त होता था मेरे पास और मैं कहीं और गुम होती थी कई दिन से वक्त आया नहीं मेरे पास बहुत ढूंढ रही हूं कि मिल जाए तो इस बार न करूं वो गलती तुम्हारे ख्यालों के चलते वक्त को दरकिनार कर दिया पर आज लगता है वक्त ने मुझे दरकिनार कर दिया कोई किसी के लिए कहां ठहरता है वक्त ने भी इंतेजार किया, थोड़ा ठहरा और फिर चल दिया... अब मैं उसे ढूंढ र...

बंद दरवाजों से खुला लगाव

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बंद दरवाजों के अंदर पता नहीं क्या अजीब सा आकर्षण होता है, जिसकी तरफ मैं बहुत आकर्षित होती हूं। एक तिल्सिम के तरह लगते हैं वो। और बंद दरवाजों के इसी आकर्षण के चलते पता नहीं कितने पेज इंस्टाग्राम पर मैंने फॉलो किए हैं। जब उन बंद दरवाजों की फोटोज को देखती हूं तो लगता है जैसे कई राज बंद हैं इन कपाटों के भीतर अगर ये कपाट अचानक से खुल गए तो पता नहीं क्या बाहर आ जाए। ये बंद दरवाजें कई बार खुद के जीवन की तरह ही लगते हैं। हमारे अंदर भी बहुत सारे दरवाजें हैं, जिन्हें हम बंद किए रहते हैं। किसी एक स्याह लम्हें या कहें चोर लम्हें में हल्का सा खोल कर दरवाजे के अंदर की तरफ छांक भर लेते हैं, ये तसल्ली करने के लिए हमारे राज अभी भी इस दरवाजें के अंदर कैद है ना। कितनी कसक होती है ना इन बंद दरवाजों में। कई बार एक मूक वेदना होती है कि खोल दो हमें, अब और कैद कर नहीं रख सकते हैं उन रहस्यों को, उन बातों को जिन्हें कोई बंद करके चला गया है हमारे अंदर। बंद दरवाजों का ये रहस्य और भी गहरा हो जाता है जब खिलड़िकयों का भी कोई पल्ला खुला ना हों वो बंद हों जैसे वो राजदार बनना चाहती हों दरवाजों की। एक भरोसेमन दोस्त की...