पीठ पर

वो बहुत आगे बढ़ चुका था
ऐसा वो खुद सोचता था
उसे लगा उसके आगे बढ़ जाने से
जिंदगी की बीती हुई चीजें भी पीछे छूट जाएंगी
पर उसे नहीं पता था
कि वो अपनी पीठ पर
अपनी पुरानी जिंदगी को ढो रहा था
पीठ पर कभी जो उसकी मोहब्बत ने
उसकी और अपनी कहानी लिखी थी
वो कभी उसे मिटा नहीं पाया
क्योंकि वो अपनी पीठ नहीं देखता था
वो बस आगे बढ़ रहा था
और उसकी पीठ पर उसकी पूरानी जिंदगी
एक बेताल की तरह उससे चिपकी हुई बैठी थी
वो जितना आगे बढ़ता जिंदगी में
पुरानी बातें और यादें भी उतना ही आगे बढ़ जाती
उसी की ही जिंदगी में
पीछे छुटी हुई चीजें अक्सर
अक्सर पीछे पीठ पर चिपक के रह जाती हैं...


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