अछूत कन्या
अरे, अरे, फिर सामने
पड़ गई, हटो सामने से, तुम्हें मना किया है न कि महीने के उन दिनों में तुम पूजा
के लिए जाते वक्त मेरे सामने न पड़ा करो।
तो मैं कहां आपके
सामने आ गई, आप ही आई हैं मेरे सामने
अरे राम रे लड़की
तुलसी के पौधे से सटकर क्यों खड़ी है, तुलसी मुरझा जाएंगी... मना किया है न कि उन
दिनों में तुलसी के पौधे को नहीं छूते।
हद है, क्यों नहीं
छूते... मैं तो हर वक्त इन्हें पानी देती हूं, समझीं, क्या ये मुरझाईं और एक बात
ये पौधे हैं, इन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि मेरे शरीर में क्या बदलाव हो रहा है,
बस इन्हें एक चीज से फर्क पड़ता है कि मेरा स्वभाव न बदले, ये प्यार करते हैं मुझे
और मैं इनसे।
अच्छा एक बात कहूं
मां,
मां पूजा का काम
करते हुए बोली, हां बोलो...
अच्छा नानी भी आपके
साथ ऐसा व्यवहार करती थीं जैसा आप मेरे साथ करती हैं?
हां, जब तुम्हारी
उम्र की थी न मैं, तो नानी भी यही सब करती थीं मेरे साथ
तब आपको कैसा महसूस
होता था?
वैसा ही महसूस होता
था, जैसा अब तुम्हें हो रहा है, बहुत गुस्सा आता था...
तो आपने कोई विरोध
क्यों नहीं किया?
मां कुछ खोए हुए
अंदाज में बोलते हुए, नहीं कर पाई विरोध, मेरी हमउम्र की सारी लड़कियों के साथ ही
तो ऐसा होता था तो क्या बोलती मैं।
मां काश आप उस वक्त
कुछ बोल देती तो थोड़ा ही सही कुछ बदलाव तो होता। थोड़ा आप बदलाव करतीं, कुछ मैं
करूं, कुछ मेरी बेटी करे भविष्य में.... ऐसे ही तो बदलाव आएगा मां समाज में, अच्छा
बदलाव आएगा... यूं भी अच्छी पहल छोटी ही सही पर होनी ही चाहिए।
मां--- सच कहा
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