सिर्फ शहर भर नहीं है... जयपुर

जयुपर सिर्फ एक शहर भर नहीं है मेरे लिए बल्कि वो है घर से पहली बार अकेली आई लड़की का इस्तकबाल करता मेज़बान, पहली नौकरी की खुशी में खुश होता जैसे गुलाबी गाल, घर से पीजी और पीजी से अपने कमरे तक का सफर, अनजानों के बीच अपनों को खोजना, ऑफिस के माहौल को घर में तब्दील करना, चौड़ा रास्ता से निकलकर अजमेरी गेट तक जाना, छोटी चौपड़ और बड़ी चौपड़ में खरीदारी करना, एम आई रोड के शोरूम को जी भर के देखना और लस्सीवाले के यहां से समोसे, लस्सी पीना, मालवीय नगर की हर गोलगप्पे के ठेले का स्वाद चखना। वो है पहली कमाई की ढेर सारी शॉपिंग करना, संडे की मस्ती जीटी में बिताना, world tread park के सिने पॉलिस में सस्ती दर में फिल्में देखने के लिए संडे की सुबह की नींद खराब करना, पहली बार सलवार सूट पहनने वाली लड़की का शर्ट और जींस पहनकर थिएटर में पहली बार फिल्म देखना, मैक डी में पहली बार फ्रेंच फ्राइज खाते हुए दोस्तों की हंसी वाला ताना सुनना कि ये तो देवी का अवतार है जो पहली बार मैक डी में आई हैं, मदर्स डे पर मां से दूर होने के बाद भी मैक डी जाकर उस दिन को सेलिब्रेट करना, घर वालों से दूर पहला जन्मदिन शानदार तरीके से मानना वो भी दोस्तों और ऑफिस के कलीग्स के साथ, घंटों पीजी की छत पर अकेले बैठकर अरावली की वो पहाड़ियां देखना, पीजी की दोस्तों के साथ सावन के मौसम में चूलगीरी जाकर मस्ती करना, अकेले कमरे में अकेलेपन से लड़ते हुए खुद की सिसकी सुनना और दरवाजा खोलने पर हमेशा हंसते हुए दिखना, सपनों और अपनों की जंग को अकेले ही झेलना, खुद के सवालों में उलझा हुआ पाना, शहर की फितरत को इंसानी फितरत में ढूंढना, जेकेके में शाम को होने वाले थिएटर को देखने के लिए पागलों की तरह काम कर ऑफिस से जल्दी निकल जाना, थिएटर फेस्टिवल के बेहतरीन नाटकों को देखने के लिए सर्दी की शांत रातों में हिम्मत कर अकेले रूममेट के साथ जाना, लोकरंग के उत्सव में अपने प्रदेश का डांस देख खुश हो जाना कि और लोकल दोस्तों को बताना हमारे यहां ऐसा होता है, बरसात में भींगने के लिए बारिश में ही ऑफिस से निकल जाना और कमरे पर आकर सीधे छत की तरफ भागना, खुद से नाराज होना और खुद से लड़ना भी, अकेले में अपनी पागलपंती पर हंसना, अपना सारा अकेलापन, नाराजगी, गुस्सा फोन पर दीदी पर निकालना, मोबाइल से एक प्यार भरा रिश्ता बना लेना, ऑफिस की मस्ती भरा माहौल, ऑफिस के कलीग्स का प्यार जो वो हर वक्त लुटाते थे, शांत रहने पर बॉस का पास कर पूछना कि घर की याद आ रही है? कोई रिश्ता न होते हुए भी एक अनकहा सा रिश्ता ऑफिस के दोस्तों से बन जाना, कैंटीन में सबकी टिफिन पर हक से कब्जा करना और दूसरे दिन का मेन्यू सेट कर उन्हें बेधड़क ऑर्डर देना, कुछ भी स्पेशल होने पर हर किसी का सिर्फ मेरे लिए इंतजार करना कि पहले मैं ये स्पेशल डिश खाऊं, अपनी सैलरी से पहली बार लैपटॉप और मोबाइल लेने पर पागलों की तरह खुश होना, कोई भी छोटी खुशी क्यों न हो खुद को दो गुलाबजामुनों की ट्रीट देना, ऑफिस में बेमतलब की कचौड़ी और समोसे वाली पार्टी, पीजी के कमरों और शहर की सड़कों पर अपनी जैसी ही लड़की की तलाश करना, खुद के शहर से जोड़ता हुआ कुछ न कुछ खोजना, सड़क किनारे बंजारों और अपने बीच कोई फर्क न कर पाना, अपने अंदर के डर को जीत कर खुद ही अकेले हर चीज करने जाने, कुछ रिश्ते खोने के बाद बहुत सारे बेहतरीन रिश्तों को अपने अंदर समेटना जो सिर्फ शहर तक सिमटे नहीं है बल्कि वो दिल तक उतर चुके हैं....... और भी बहुत कुछ जो इस शहर में मैंने जीया है, किया है, ऐसे में जयपुर को सिर्फ एक डेस्टीनेशन, एक शहर की परिभाषा में तो नहीं बांध सकती न मैं, क्योंकि हम दोनों ने एक दूसरे से बहुत कुछ साझा जो किया है।

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