मुझे चांद चाहिए...... जिंदगी को जीने की एक तमन्ना

क्या हुआ... थोड़ी परेशां लगी रही हो? पढ़ ली पूरा उपन्यास
हां, कल ही रात को खत्म की, उसी का असर है शायद जो चेहरे पर आपको दिखाई दे रहा है।
कैसा लगा वो नॉवेल... शानदार था न
हां बहुत ही शानदार था।
एक बात बोलूं, हां बोलिए न
मुझे न उपन्यास की जो नायिका है न, वर्षा वशिष्ठ बहुत ही महत्वाकांक्षी लगी, तुम्हें लगी क्या?
मुझे तो नहीं लगी, आपको वो किस एंगल से महत्वाकांक्षी लगी जरा बताइए तो।
मुझे तो हर्ष महत्वाकांक्षी लगा।
एक बात बताइए जरा अपने सपने को पूरा करने के लिए कौन सबसे पहले मायानगरी गया था, हर्ष न,
कौन वहां के ग्लैमर में खो गया था, हर्ष न, वहां जाकर अपने रिश्तों को कौन नहीं संभाल पाया था, यहां तक कि खुद को भी, हर्ष न, जलन, कुंठा की भावना किसके अंदर पहले जन्मी, हर्ष के मन में न। मेरी इन बातों से ये मत समझिएगा कि मैं घोर नारीवादी हूं, बस मैं आपके उस बात का जवाब दे रही हूं जो आपने वर्षा के लिए पूछे हैं।
पता है आपको, हम सबके अंदर एक झिलमिल, एक वर्षा हैं, बस बहुत कम लोग हैं जिन्हें दिव्या सान्याल मिल पाती हैं। बहुत कम लड़कियां हैं जो अपने हिस्से के आसमां को पाने के लिए वर्षा जैसी हिम्मत कर पाती हैं। वो सिर्फ एक चांद की ख्वाहिश नहीं होती है, वो उस आसमां की ख्वाहिश होती है जहां वो चांद चमकना चाहता है। 
हममें से हर कोई अपनी जिंदगी जीना चाहता है, अगर हमारे उस स्टेप में कोई हमारा साथ देता है तो वो हमें अपना सा लगता है, शायद यही वजह है कि वर्षा और दिव्या का रिश्ता इतना मजबूत बना रहा आखिरी तक।
अगर शूरू से देखा जाए तो एक चीज समझ में आती है कि अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीने के लिए झिलमिल ने बहुत संघर्ष किया तब जाकर वो कहीं वर्षा वशिष्ठ बन पाई। चाहे वो पहली बार स्कूल में प्ले करना हो, या फिर थिएटर के अपने जूनून के कारण घर छोड़ना पड़ा हो, एनएसडी में एक बेहतरीन अदाकारा के रूप में खुद को स्थापित करना हो, एक प्रेमिका के रूप में खुद को साबित करना हो, मायानगरी की एक बेहतरीन अभिनेत्री का मुकाम हासिल करना हो या फिर खुद को एक अच्छी बेटी और बहन के रूप साबित करना हो।
वर्षा ने कभी भी ज्यादा चीजों की महत्वाकांक्षा की ही नहीं, सिवाय खुद की जिंदगी खुद के शर्तों पर जीने की। और ये उस हक था न कि महत्वाकांक्षा। दूसरी बात अगर आपके पास प्रतिभा है, मेहतन करने की क्षमता है, विनम्रता है, विवेक है तो सफलता आपको मिलेगी ही न। वर्षा को एक बेहतरीन अभिनेत्री का तमगा कोई प्लेट में सजा हुआ तो नहीं मिला न, उसने उसे हासिल किया। रही बात हर्ष की तो उसकी एक खासियत है कि शुरुआत में उसने वर्षा को सराहा, उसे प्रेम किया, उसने एक तरह से परोक्ष रुप में वर्षा को परिपक्व बनाया कि वो एक पुरुष और स्त्री के संबंध को बेहतर रूप से समझ सके।
वर्षा तो कभी हर्ष की सफलता को लेकर कुंठाग्रस्त नहीं हुई तो आखिर हर्ष ही क्यों हुआ। शायद इसलिए की हर पुरुष में एक ईगो होता है मेल ईगो जो कहीं न कहीं उसके अंदर के उस प्रेम के ऊपर भारी पड़ जाता है जो वो अपनी स्त्री से करता है। और उसी ईगो को हर्ष हरा न सका, उस कुंठा को हरा नहीं सका जो एक हारे पुरुष में होती है जब वो अपनी स्त्री को सफल होते हुए देखता है, जबकि अगर स्त्री-पुरुष साथ में हो न तो सफल कोई भी हो सफलता दोनों की ही मानी जाती है।
अरे बस-बस बाबा, मैंने एक बात क्या कही तुमने तो नॉवेल की समीक्षा ही कर डाली...
नहीं-नहीं ऐसा नहीं बस मुझे जो समक्ष में आया वो बात मैंने आपसे कही और हां समीक्षक नहीं हूं मैं, बस एक पाठक हूं, और मैंने अपनी बात उस हिसाब से ही कही है।
हां लगता तो यही है, खैर तुम्हारी बातें सुनकर मुझे पता लग चुका है कि अभी तुम इस उपन्यास के आगोश में काफी दिन रहोगी, उसका सुरूर उतरने में थोड़ा वक्त लगेगा।
हम्म..शायद आप सही कह रही हैं, इतना सुरूर भी सही नहीं है....
नहीं ऐसा नहीं है, उपन्यास को पढ़ो, सोचो, गुनो पर उसे अपने ऊपर हावी मत होने दो।
सही कहा शायद आपने।

#एक पाठक की राय



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