जूड़ा

तुम हमेशा जूड़ा क्यों बाधंती हो?
मेरे ये पूछने पर वो हंस देती है
और कहती है... पता है..
इसमें मैंने तुम्हारे समाज को बांधा है
समाज और जूड़े में भला क्या संबंध?
संबंध तो हर किसी का हर किसी से है
अपने इस जूड़े में मैं बांधती हूं
समाज की रूढ़ियों को
उन जंजीरों को बांधती हूं
जो आगे बढ़ने से रोकती हैं मुझे
उन बेमकसद के सवालों को बांधती हूं
जो हर दफा मेरे घर से निकलने पर पूछे जाते हैं
उस सोच को बांधती हूं जो मुझे
एक लड़की सोच कमतर समझती है
उन तानों को बांधती हूं
जो मेरे असफल होने पर मुझे मिलते हैं
उन निगाहों को भी जूड़े में समेटती हूं
जो मुझे सिर्फ जिस्म समझते हैं
उन सारी रस्मों को बांधती हूं
जो एक लड़की होने के नाते
मुझपर थोपे गए हैं
और भी बहुत कुछ बांधती हूं
इस जूड़े में
कभी जो बाल खुल जाते है न मेरे
तो ऐसा लगता है कि
वो सारी रुकावटें मेरे सामने आ गई
सुनो... सुंदर दिखने के लिए
नहीं बांधती मैं अपने बालों को
 बस खुद को आज़ाद रखने के लिए
बांधती हूं इन्हें

ताकि लट के रूप में कोई बाधा न आ जाए।

दिव्या

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