कुरुई, मऊनी और भोजपुरिया संस्कृति
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में सरपत की मूंज से रंग बिरंगी, कटोरी जैसी एक वस्तु बनाई जाती है जिसे भोजपुरी में कुरुई कहते हैं। अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली में लगने वाले हुनर हाट में कुछ दोस्तों के साथ गई, तो वहां तरह तरह के सामानों के बीच कोने में लगे एक स्टॉल में जो चीज़ दिखी, जो अपने गांव- देस की लगी, वो थी कुरुई । उसे देखते ही मेरे मुंह से जोर से निकला अरे कुरुई, मेरे साथ आये दोस्तों ने (जिसमें एक कानपुर की, एक मेरठ का और एक असम का था) बोला क्या कहा तुमने, मैंने कहा अरे ये कुरुई है, हमारे यहां गांवों में खाने के लिए इसमें ही दाना, भूजा डाल कर दिया जाता है। दुकानदार ने कहा मैडम आप कहाँ की है हम बोले जौनपुर के, तो मुस्कुराते हुए बोला तभी आप इसका देसी नाम जानती हैं। थोड़ी बहुत बात होने के बाद जब दाम की बात आई तो बोला मैडम हम अमेठी के हैं आप जौनपुर की तो चलिए 50 रुपये कम कर देते हैं ₹150 की है हम आपको ₹100 में देते हैं। मैंने मजाकिया अंदाज में भोजपुरी में बोला का भाय गांव देस क हउआ, इतना महंग देत हया... वो बोला ऐसी बात है तो मैं पैसा ही नहीं लूंगा, तो मैंने हंसते हुए कहा नहीं आप 100 रुपये ले लो। वहीं पर मौना जो डोलची जैसा होता है (मौना कुरुई से थोड़ा बड़ा होता है और उसमें ढक्कन लगा रहता है, दादी और मम्मी के ज़माने में औरतें उसमें अपना निजी सामान रखती थीं। मौना भी मूंज से ही बनाया जाता है।) रखा हुआ था, उसकी तरफ इशारा करते हुए मेरी दोस्त ने कहा कि ये क्या है, दुकानदार ने कहा कि मैडम इसमें रोटी रखी जाती है। खैर उस वक़्त मुझे भी मौना का नाम नहीं याद आया, नहीं तो अपनी दोस्त को बताती। गांव में जो कुरुई महिलाओं की सुघड़ता की निशानी मानी जाती थी कभी,उसे हम जैसे बंजारे लोग 100 रुपये में खरीद,घर ले आते हैं। खैर जब घर आई और पापा को कुरुई दिखाई तो पापा खुश हो बोले तुम्हें कहाँ से मिली, सारा किस्सा उन्हें सुनाया तो मुस्कुराए। बड़ी दीदी को फ़ोटो भेजी तो उन्होंने कॉल किया और बताया कि आजी (दादी को हम लोग इसी नाम से बुलाते थे) द्वारा उनकी विदाई में दी गई कुरुई उन्होंने सम्भाल कर रखा है। मम्मी कुरुई देख अलग खुश हो रहीं थीं और बता रहीं थी कि कैसे कुरुई बनाती थीं वो लोग गर्मी के लंबे दिनों में। इसी बीच छोटा भतीजा बोला ये डेकोरेशन का सामान आप कहाँ से लाईं, हमने इसे अपनी ट्यूशन वाली मैम के घर देखा है, पर उनके यहां तीन है आप तो बस एक लाईं। उसकी बात सुन पापा बोले बेटा ये सजावटी सामान नहीं है, बल्कि ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है, वो भोजपुरिया संस्कृति जिसे हम भूलते जा रहे हैं। पापा सही कह रहे थे, भोजपुरिया समाज की एक सामान्य सी वस्तु, जो कभी आम जीवन का हिस्सा होती थी,घर की समृद्धि, सुघड़ता की परिचायक होती थी, वही अब हुनर हाट जैसे जगहों पर डेकोरेशन पीस के तौर पर मिल रही है। और आधुनिकता की दौड़ में हम उन चीजों को भी भूले जा रहें हैं जो कभी हमारे अस्तित्व का हिस्सा रहीं हैं।

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