साथ चलना...
साथ चलना भी एक कला है। साथ चलने के दौरान कई बार तेज़ चाल से आगे निकल जाना, फिर ध्यान आने पर, रुक कर साथी का इंतज़ार कर, फिर एक बार साथ चलना। बातों के समंदर में दोनों का डूबना और उतराना। या रास्ते की तन्हाई में दोनों का चुपचाप चलना। एक का मन हल्का करना तो दूसरे का बस प्यार से उसे सुनना। रास्ते में पड़ रहे पड़ावों को ले अपने-अपने अनुभव बताना। साथ चल रहे अजनबी यात्रियों को ले दोनों का नोंकझोंक करना। और साथ वाले इस सफर के लिए ईश्वर का शुक्रिया करना।
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...पर साथ चलना इतना भी आसान नहीं है। सिर्फ दो लोगों का रास्ते पर साथ-साथ चलना ही, उन्हें नहीं जोड़ सकता। वो तो तब जुड़ते हैं, जब अपना सारा गुस्सा, अहम, सर्वोपरि की भावना, इन सबको किनारे रख। बस हाथ में हाथ डाले, एक दूसरे के अस्तित्व और व्यक्तित्व का सम्मान करते हुए, जीवन की यात्रा करते हैं। अगर कभी यात्रा में वो हमसफर अलग भी हो जाए, तो अकेले के अपने सफर में, उसके साथ की गई सभी यात्राओं को सोच एक निर्मल मुस्कान चेहरे पर आए, शायद यही है साथ चलना। साथ चलने की यही कला, हमारे
जीवन पथ को सुगम बनाती है।
#एक_लड़की_के_नोट्स

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