गुमसुम सा वो पाठक

हिंदी साहित्य की यह विडंबना है कि आज के समय में लेखक ज्यादा हैं पाठक कम... इस माहौल में ऐसे सुधी पाठक देख मन को सुकून मिलता है। पुस्तक मेला में विभिन्न प्रकाशनों के स्टॉल्स घूमने के दौरान यह सज्जन मुझे पूरी तल्लीनता के साथ उस बेहद कम भीड़ वाले प्रकाशन स्टॉल पर किताब पढ़ने में मशगूल दिखे। मेला के दौरान कई बार मैंने इन्हें एक स्टॉल से दूसरे स्टॉल जाते देखा। पर कुछ बात थी इनमें जो हिंदी के अन्य पाठकगणों से इन्हें अलहदा बना रही थी। मैंने देखा कि यह उन प्रकाशनों के स्टॉल्स पर नहीं जा रहे थे जहां सोशल मीडिया के प्रसिद्ध लेखकों और उनके आगे-पीछे मधुमक्खियों के छत्ते की भिनभिनाहट सी सो कॉल्ड पाठकों की भीड़ थी, यह चुपचाप उन प्रकाशनों में जा रहे थे जहां ज्यादा भीड़ नहीं थी और पूरी संजीदगी के साथ एक-एक किताब देख रहे थे कुछ अच्छी लग रही थीं तो उन्हें पढ़ रहे थे। एक प्रकाशन से दूसरे प्रकाशन जाने के दौरान मैंने इनके अंदर किताबों के लेकर एक तड़प देखी, जैसे कुछ ढूंढ रहे हैं जो मिल नहीं रहा है। 

किताबों के लेकर यह अकुलाहट मैं समझ सकती हूं क्योंकि मैंने भी कभी दो किताबों की खोज में वो बेचैनी महसूस की थी। पहली किताब थी मुझे चांद चाहिए, जयपुर प्रवास के दौरान मैंने इसे बहुत ढूंढा था। उस वक्त वह थोड़े समय के लिए आउट ऑफ प्रिंट थी, दूसरी किताब थी स्त्री उपेक्षिता, आईआईएमसी में पढ़ाई के दौरान अनुवाद कैसे किया जाए इस पर चर्चा करते हुए हमारे हिंदी विभाग के अध्यापक आनंद प्रधान ने उस किताब का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि प्रभा खेतान जी ने  Simone De Beauvoir की The Second Sex का अनुवाद इतना बेहतरीन किया है कि वह मूल किताब से ज्यादा प्रभावी है। खैर उसकी खोज में दिल्ली क्या, जयपुर क्या,कोलकाता तक दोस्तों को परेशान किया था मैंने। यूं तो पापा के पास वह किताब थी पर जैसा की किताबों के शौकीनों के साथ यह दिक्कत देखने को मिलती है कि उनका कौन सा मित्र उनकी कौन सी किताब ले गया है यह याद नहीं रहता, ठीक वैसे ही पापा को भी यह याद नहीं था कि स्त्री उपेक्षिता किताब उनका कौन सा मित्र ले कर गया है।  इस दौरान यह पता चला कि 2007 से स्त्री उपेक्षिता किताब कॉपी राइट मुद्दे के कारण प्रकाशन में नहीं थी। 
 एक दिन अचानक भाई साहब के मित्र मनोज पांडे जी और उनकी पत्नी स्मिता जी के साथ किताबों पर जिक्र चला और स्त्री उपेक्षिता किताब पर बात हुई तो स्मिता जी ने कहा कि अरे यह किताब तो मेरे पास है, मेरे भाई को प्राइज के तौर पर उसके कॉलेज की तरफ से मिली थी। मेरी उस किताब को लेकर बैचेनी महसूस कर उन्होंने मुझे वो किताब दे दी।  किताब तो मेरे पास है पर अबतक 10 पन्नों से ज्यादा मैंने पढ़ा नहीं उसे। मेरे अंदर एक बहुत बड़ी कमी है कि जिस किताब को मैं शिद्दत से ढूंढती हूं उसे बेहद सूकुन के साथ पढ़ना चाहती हूं। मुझे चांद चाहिए भी खरीदने के करीब एक साल बाद मैंने पढ़ा। 
खैर मुद्दे पर आते हैं, तो  इन वृद्ध सज्जन की किताबों के प्रति बैचेनी और चाव मेरे लिए इस साल के पुस्तक मेला का हासिल रहा। जहां एक तरह भेड़ चाल की तरह लोग किताबें, सेल्फियां ले रहे थें, पीआर कर रहे थे, प्रसिद्ध लेखकों के आसपास मंडरा रहे थे वहां ये सुधी पाठक पुस्तकों का नितांत अकेले में रसास्वादन कर रहे थे इस बेतकल्लुफी के साथ की भीड़ के साथ कोई लेखक जा रहा है।

#एक_लड़की_के_नोट्स

टिप्पणियाँ

  1. वाह दिव्या तुम स्वनाम धन्य हो,एक श्रेष्ठ रचनाकार हो,लेखन का क्रम जारी रखो

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