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कृष्ण अपने बाएं  तलवे से बहती रक्त की उस पतली धारा को अपलक देख रहे थे। अचानक कृष्ण अपने अतीत की स्मृतियों में खो गए। एक दिन जब कृष्ण द्वारका के अपने महल में लेटे हुए थे,और रुक्मिणी उनके शरीर पर चंदन का लेप लगा रहीं थी तो कृष्ण के तलवे पर चंदन का लेप लगाते, लगाते रुक्मणि कहीं खो सी गईं ।  कृष्ण ने रुक्मिणी को खोए हुए देखा तो बोले क्या हुआ देवी? कोई बात ?आप यूँ अचानक कहाँ खो गईं? रुक्मिणी कृष्ण की आवाज़ सुन चौंक उठीं, कृष्ण के प्रश्न का उत्तर देते हुए बोलीं, प्रभु मन में एक प्रश्न है कि हाथों की रेखाओं की तरह पैरों के तलवों पर भी तो रेखाएं होती हैं, क्या वो भी हाथों की रेखाओं की तरह ही हमारे भविष्य का निर्धारण करती हैं? कृष्ण रुक्मिणी की बात सुन मुस्कुराए और बोले, हां देवी कर्म प्रधान इस जीवन में हाथों और पैरों दोनों की रेखाएं हमारे भविष्य का निर्धारण करती हैं। जिस प्रकार हमारे हाथों द्वारा किये गए कार्य ही हमारे भविष्य के अच्छे या बुरे होने का संकेत देते हैं  ठीक उसी प्रकार हम किस परिस्थिति के वशीभूत हो जीवन में कौन सा मार्ग अपनाते हैं यह हमारे पैरों की रेखाओं द्वारा ही निर्धारित होता है। 
जरा का रुदन सुन कृष्ण अपने वर्तमान में फिर लौट आये और अपने जीवन चक्र को आंख बंद कर मन की आंखों से देखने लगे। कालकोठरी में जन्मा एक असाधरण बालक, जिसका जीवन बचाना अति आवश्यक था। उसे बचाने के लिए वासुदेव बाबा उफनती यमुना में बालक को  टोकरी में डाल गोकुल ले आये। इसी चरण को स्पर्श कर यमुना ने अपना वेग कम कर दिया था। कर्म के चलते ही तो ये पैर गोकुल से जो चले कि कभी फिर इन पांवों ने गोकुल और वृंदावन की मिट्टी का स्पर्श न किया। जीवन के चक्र में एक आम आदमी की तरह फंसे परमावतार कृष्ण ने जब मथुरा छोड़ द्वारका की तरफ गमन किया तो वे ये कहाँ जान पाए कि ये गमन इन पांवों में लिखा था। मन ही मन कृष्ण मुस्कुराए। अचानक से जरा उनके पैरों पर गिर क्षमा मांगने लगा। कॄष्ण ने आंख खोल उसे देखा। जरा बोला प्रभु आप जैसे को तीर मार मैंने महापाप किया। इन कोमल चरणों की कभी धूल भी न मिली मुझे और मुझ जैसे महापतित ने उन्हीं चरणों को हिरन समझ तीर मार दिया। प्रभु मुझे माफ़ करें। कृष्ण मुस्कुराए और बोले, जरा तुमने पाप का नहीं पुण्य का काम किया है बन्धु। कर्म प्रधान इस जीवन के सारे कर्मों को मैंने पूरा कर लिया था, तुमने तो मुझे इस जीवन से मुक्त किया है, जिसका मैं आभारी हूँ। कृष्ण बोले, ज़रा तुम यह कदापि मत सोचना की तुमने मुझे यह बाण मारा है बल्कि वत्स यह तो मेरे चरणों की नियति थी। और नियति को न तो मैं टाल सकता हूँ और न ही तुम। इसलिए विलाप करना बंद कर दो। यह कहते कृष्ण ने मृत्यु लोक के उस संसार को आखिरी बार देख, अपनी आंखों को सदा के लिए बन्द कर लिया।

दिव्या द्विवेदी

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