कुुछ कहा और बहुत कुछ अनकहा है...ठीक तुम्हारे पीछे


कहानियों में अक्सर हम आम इंसान खुद के लिए एक सूकुन की तलाश करते हैं, वो जो शायद हमें वास्तविक जीवन में नहीं मिल पाता है, या फिर जिसे हम शायद पा भी नहीं पाते हैं,  पर उन कहानियों का क्या जिन्हें पढ़ने पर आप खुद के अकेलपन से मिलने को बैचेन हो जाएं। आपको लगे कि आप अकेले नहीं है जिनके अंदर अकेलापन, स्याहपन है बल्कि ये जो लेखक है न जिसका आप कहानी संग्रह पढ़ रहे हैं वो भी कहीं अपने अकेलेपन और स्याहपन को जी रहा है साथ ही कागज पर उतार भी रहा है। हो सकता है कि कुछ उसका भोगा यथार्थ हो कुछ अकेलेपन की कल्पना मात्र, पर जी तो रहा है ना।

मानव कौल थिएटर का एक जाना पहचाना नाम है, उनसे मेरा परिचय दो साल पुराना है वो भी उनके एक नाटक कलर्स ब्लाइंड के जरिए, बेहद ही संवेदनशील ये नाटक कहीं न कहीं मेरे जेहन में बैठ सा गया था जब मैं उसे देखकर आई थी। वर्चुअल दुनिया में किसी इंसान को ढूंढना उतना भी मुश्किल नहीं जितना कि पास रह रहे अपने किसी रिश्ते को ढूंढना। खैर उनके बारे में सारी डिटेल गूगल, फेसबुक और इंस्टाग्राम से मिल गई। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इंस्टाग्राम का अकाउंट मैंने सिर्फ और सिर्फ उन्हें पढ़ने के लिए ही बनाया था, साथ में अगर कहीं अच्छी तस्वीर दिख जाती तो सोने पर सुहागा।

बरहाल कुछ ही महीने पहले उनका पहला कहानी संग्रह ठीक तुम्हारे पीछे आया...लेने का बहुत मन था पर साइत ही नहीं बैठ पा रही थी कि वो किताब ऑनलाइन मंगवा सकूं। ये साइत बैठी जन्मदिन पर, खुद के लिए तोहफा देना था मुझको तो मानव की किताब मंगा ली और खुद को जन्मदिन का तोहफा दिया कि लो भाई दिव्या पढ़ो अपने पसंदीदा राइटर को।

पहला पन्ना जो उन्होंने एक तरह से भूमिका लिखी थी वो मैं पहले ही इंस्टाग्राम पर पढ़ चुकी थी, उनकी कविता, जिसके नाम से संग्रह का नाम पड़ा था वो पढ़ा, जैसे-जैसे उनकी कहानियां पढ़ती गई एक बात समझ में आ गई कि ये उन कहानियों से बिल्कुल अलग हैं जिन्हें मैंने अब तक पढ़ा हुआ है। एक स्याहपन लिए हुए है हर एक कहानी, वो स्याहपन जो कि किताब के कवर पर भी आपको दिख जाएगा, पर किताब के कवर की तरह ही एक खिड़की हर कहानी में मौजूद है जिससे होकर आप उस कहानी में खुद को पा सकते हैं। कई बार कहानियों में कुछ ऐसी लाइने हैं जो बेहद सटीक ढंग से हमारी खुद की जिंदकी को भी डिफाइन करती हैं।

मानव की कहानियों की कुछ लाइन्स.....

वह कहती थी कि हमें हमेशा अधूरे सपने याद रहते हैं। बीच की खाली जगह। आधे कहे हुए संवाद। चुप्पी। (कहानी- सपना)


हम कितना फिक्शन में जीते हैं! जीना बहुत ही क्षणिक होता है। कभी-कभी हम किसी आश्चर्य को जी लेते हैं। उसके पहले और बाद में हम फिक्शन में ही रहते हैं। (कहानी- मौन में बात)

खालीपन को भरने की मूर्ख कोशिश जब भी हम करते हैं, पर क्या खालीपन को कभी भी भरा जा सकता है? वह एक स्थिति है। है ना?हम उसे हमारी सारी व्यस्तता के बाद अपनी बगल में पड़ा हुआ पाते हैं हर बार। (कहानी- लकी)

हमेशा मुझे आश्चर्य होता था कि एक निजी संबंध को अलग करने में कितने सरकारी मरे हुए शब्दों का प्रयोग किया जाता है। मुझे हमेशा वह petition एक कहानी की तरह लगता था। (कहानी- दूसरा आदमी)

मैं बड़ा होते ही दूसरा आदमी हो चुका हूं। (कहानी- दूसरा आदमी)


हर कहानी का अपना अलग कैरेक्टर है, सच कहूं तो एक बार में आप भले ही इस कहानी संग्रह को सांस रोकर पढ़ लें, पर इस कहानी संग्रह की हर कहानी को जीने के लिए, खुद के अकेलेपन और स्याहपन को खोजने के लिए आपको दोबारा इस कहानी संग्रह को पढ़ना ही पढ़ेगा। इस किताब की कहानियां उन कहानियों से बिल्कुल अलग हैं जिन्हें पढ़कर आप सुकून की सांस लेते हैं, वो भी एक मुस्कान के साथ बल्कि इन कहानियों को पढ़कर आप खुद को और मथना शुरू कर देंगे, कहीं न कहीं, कोई न कोई कहानी या कोई पात्र आपको आपके अंदर के खालीपन से रूबरू जरूर करवाएगा या उन लम्हों में जरूर ले जाएगा, जहां आप जाना शायद ही पसंद करें। एक तरह से मानव की इन सारी कहानियों को पढ़कर आप खुद से मौन में बाते करने लगेंगे।

इस कहानी संग्रह को पढ़कर मानव के बारे में एक बात जो पता चली है वो ये कि पहाड़ का आदमी भले ही पूरी जिंदगी मैदानी भागों में बिता ले पर दिल के एक कोने में उसका पहाड़, उसका गांव, हमेशा जिंदा रहते हैं साथ ही जिंदा रहती है वो टीस जो पहाड़ से अलग होने पर उसके मन में होती है। मानव के कहानी संग्रह में रिश्तों की बारिकियों को जिस तरह लिखा गया है, उन मनोंभावों को लिखा गया है जो हर इंसान के अंदर होती है वो भी शानदार है... (जब आप कहानी मां, दूसरा आदमी, टीस, पढ़ेंगे तो जान पाएंगे, यूं तो उनकी हर कहानी में रिश्तों की बारीकी दिखती है) पढ़ते-पढ़ते कई बार खुद को यूं लगता है कि हम भी अपने जीवन में वही तो कर रहे हैं जो इस कहानी का पात्र कर रहा है। कहानी भले ही आप कुछ मिनटों में पढ़ लें पर उसका हैंगओवर आपको घंटो, हफ्तों और महीनों तक बांधे रख सकता है ये गैरेंटी है। फिलहाल मुझे तो इस कहानी का अभी हैंगओवर है और दोबारा से इस कहानी संग्रह को पढ़ना है पर कुछ हफ्तों या फिर महीनों बाद नहीं तो हो सकता है इन कहानियों का खुमार कुछ ज्यादा ही न चढ़ जाए सिर पर मेरे।

( ये एक पाठक के तौर पर मेरी निजी राय है, इसे आलोचना कहना गलत ही होगा, यूं भी अपने ब्लॉग पर मैं खुद क्या सोचती हूं, गुनती हूं, बुनती हूं... ये लिख तो सकती ही हूं)


दिव्या 

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुन्दर। मानव ने एक फिल्म बनाई है हंसा इसे भी देखिएगा

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  2. शुक्रिया माधव, वक़्त निकाल के मेरा लिखा पढ़ने के लिए। मानव द्वारा निर्देशित उनकी पहली फ़िल्म हंसा अभी कुछ दिन पहले ही देखी। बेहतरीन फ़िल्म है हंसा।

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. लो अब हमने भी समय दिया उभरती लेखिका दिव्या

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  5. मोहिनी गिरि आपका भी बेहद शुक्रिया कि आपने समय निकाल लिया मेरा लिखा पढ़ने के लिए।

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