नया स्टेप, जिंदगी वाला...
मोबाइल ने एक परसेंट
बैटरी बताई फिर टू टू करते हुए खुद को बंद कर लिया, रमा ने वोदका का अभी दूसरा सिप
ही लिया था। बहुत बेमन से उसने मोबाइल देखा और फिर से वोदका पीने लगी। कॉलेज टाइम
से उसे वोदका पीने का बहुत मन करता था, कि आखिर इसका स्वाद होता कैसा है। मौका मिला 15
साल बाद वो भी आज के दिन। एक नई शुरूआत वाले दिन। शुरुआत तो साल भर पहले ही हो गई
थी बस आज एक तरह से सत्यनारायण की पूजा हुई है जैसे। पिछले साल की ही तो बात है
सिंतबर का महीना था (रमा के दो सबसे प्यारे महीने हैं सितंबर और अक्टूबर, उस दौरान
जो हवाओं में सिहरन, धूप में गुनगुनापन होता है न उसे महसूस करते हुए वो खुद को यश
चोपड़ा की हीरोइन से कम कभी नहीं समझती थी) और गणपति विसर्जन का दिन था, ढोल की आवाज़
उसके कानों में पड़ रही थी, लाख कोशिश करने के बावजूद भी वो अपने पैरों को थिरकने
से रोक नहीं पा रही थी। अचानक से पता नहीं उसके मन में क्या आया कि प्रसाद का
बहाना करके बिल्डिंग से उतर नीचे सोसाइटी के ग्राउंड में आ गई और देखते-देखते क्या
झूम के नाची की हर किसी आंखें अपनी साइज से दोगुनी तो हो ही गई थीं। खैर पसीने से
लथपथ जब वो फ्लैट का दरवाजा खोली तो गुस्से वाली कई जोड़ी आंखें उसे घूर रही थीं।
आखिर उसने ऐसा किया कैसे ये काम....
बचपन में जब भी वो
नाचने को कहती तो एक ही डायलॉग उसे सुनने को मिलता, नचनिया बनना है क्या...
पढ़ाई-लिखाई तो उसके घर वालों ने करा ही दिया किसी तरह, ससुराल तो ऐसा यूनिक ढूंढा
जहां अगर सिर से पल्लू दो इंच पीछे भी खिसक गया न तो दो पुश्तों की इज्जत लग जाती
थी दांव पर। और आज अचानक ही उसने ऐसा काम कर दिया था कि सारी पुश्तों का तो जैसे बलात्कार ही हो गया हो। खैर हंगामा होना
था सो हो गया, पर पता नहीं क्यों वो आज जब बाथरूम में घुसी तो रोना नहीं आया बल्कि
हंसी आ रही थी और मुस्कुराते होंठों से बुदबुदा रही थी हंगामा है क्यों बरपा थोड़ा सा जो मैंने नाच लिया....
बाथरूम से निकल उसने सालों से पीछे छूट चुके दोस्तों में से एक दोस्त को जो बहुत नामी हो चुका था, (शोहरत और पैसे दोनों के
मामले में) को फेसबुक पर मैसेज किया कि चंद घंटे में रहने के लिए एक से दो कमरा और
नौकरी ढूंढों मेरे लिए। इतने सालों के बाद याद करने पर भी दोस्त ने दोस्ती निभाई। उसक मैसेज तुरंत आया, हाय-हैलो कैसी हो कि फार्मेलिटी
के लिए उसने पहले ही मना कर दिया था मैसेज में सो दोस्त ने कहा कमरे का इंतेजाम तो वो दो
घंटे में कर देगा पर नौकरी के लिए दो-तीन लग सकते हैं। रमा के लिए इतना काफी था।
उसने मैसेज किया तुम इसी शहर में हो, जवाब आया हां, रमा ने तुरंत मैसेज किया, ये रहा मेरी सोसाइटी
का पता कार लेकर आओ और जहां घर बताया है वहां ले चलो ताकि तुम खुद ही किराया तय कर
सको, उधर से जवाब आया ओके। इतनी देर में रमा के बैग में उसके कॉलेज-स्कूल के सर्टिफिकेट,
कपड़े, कुछ गहनें (ये गहने स्त्री धन होते हैं, मां कि बात का सही मतलब वो आज समझ गई थी), बच्ची के कपड़े और कुछ जरूरी सामान जिंदगी को फिर से शुरू करने के
लिए सब पैक हो चुके थे। उस घटनाक्रम को बीते चार घंटे हो चुके थे। गाड़ी बाहर आकर
रूक चुकी थी, उसने बेटी रागिनी का हाथ थामा और बाहर को निकलने को हुई, हंगामा फिर
हुआ उसके उम्मीद के मुताबिक, तो जवाब भी तैयार था उसका। बहुत हो चुकी है, पर अब नहीं,
अपनी बेटी को अपनी तरह नहीं बना सकती, इसको एक खुले आसमां की दरकार है इसलिए इसे
लेकर जा रही हूं। रही इनकी बात तो कुछ ही दिनों में तलाक के पेपर दे दूंगी, तलाक
होते ही दूसरी शादी फिर नौ महीने बाद ये फिर से एक बार पिता बन जाएंगे क्या पता इस बार बेटे के बाप बन जाएं और आप सब
दादा-दादी,बुआ,चाचा ठीक है। और हां पालन-पोषण का क्लेम नहीं करूंगी तो आप लोग
निश्चिंत रहें। सुनिए, रमन बिना चिकचिक तलाक दे दीजिएगा, नहीं तो आपका ही बीपी
बढ़ेगा। जवाब से सब सन्नाटे में आ गए। कार से वो नए प्लैट में पहुंची, बच्ची भी
खुश थी एक तरह से, मां तो थी न उसके पास बस और क्या चाहिए। दो-तीन दिन में दोस्त
ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर रमा को एक एनजीओ में जॉब दिलवा दिया। यूं भी रमा बोलने
और लिखने में अच्छी थी तो नौकरी ने भी उससे दोस्ती कर ली। सुकून था अब रमा और
रागिनी के जिंदगी में। एक बार रमा ने तेरह साल की अपनी बेटी रागिनी से पूछा था कि
रागिनी क्या मैंने सही किया ये फैसला करके, रागिनी ने बहुत ही शांत तरीके से कहा,
जिस रिश्ते में घुटन हो न तो उससे बाहर निकल आना बेहतर है मां, आखिर जीने का हक
सबको है। रमा थोड़े देर के लिए उसका मुंह ताकती रह गई थी, क्या वाकई में लड़कियां बहुत
जल्दी बड़ी हो जाती हैं। एक साल पहले शुरू किए सफर की आज फिर से शुरूआत हुई है रमन
और रमा का तलाक हो चुका है। पर न जाने क्यों रमा और रागिनी खुश हैं। दोनों
एक-दूसरे की दोस्त तो पहले से ही थीं पर अब प्यार बन चुकी हैं एक-दूसरे का और
बेहतरीन साथी भी। बेफिक्र होकर जिंदगी जीने लगी हैं दोनों। एक दिन यूं ही स्कूल से
आने के बाद शाम को एक-साथ चाय पीते हुए रागिनी ने मां से कहा शुक्रिया, मां, इतनी
कम उम्र में आपने अपने लिए जीने का सबक मुझे सिखा दिया। हो सकता है कि आपके लिए ये
शुरूआत बहुत देर वाली रही हो पर मेरे लिए नहीं। रमा मुस्कुरा रही थी। आज रागिनी ने
स्कूल से आते ही पूछा क्यो डार्लिंग पहली बार वोदका पीकर कैसा लग रहा है। पुरानी
यादों को वोदका के सिप में पीते हुए रमा बोली जानेमन बहुत मजा आ रहा है। दोनों पुरानी
सहेलियों की तरह दिल खोलकर तेज-तेज हंसने लगती हैं।
तुम्हारे लेखन में दिन-प्रतिदिन निखार हो रहा है। कहानी का विषय बहुत अच्छा है और उसे बुना भी अच्छे तरीके से गया है। यह पढ़कर मुझ तुम पर ही नहीं, बलि्क अपने आप पर गर्व हो रहा है। हां, थोड़ी मेहनत तुम्हें वाक्य विन्यास पर करनी होगी। अगर उसमें कसावट आ गई तो उम्दा लेखिकाओं की फेहरिस्त में तुम्हें शामिल होने से तुम्हें कोई नहीं रोक सकता...।
जवाब देंहटाएंतुम्हारी अपनी ही
शालिनी
मेरे लेखन में आपका योगदान बहुत ज्यादा है, और आपके योगदान को मैं शब्दों में नहीं बांध सकती हूं। ये मेरे लिए सबसे ज्यादा हर्ष की बात है कि आपको मेरे ऊपर थोड़ा सा सही पर गर्व हुआ। गुरू अगर ये बात कहे तो शिष्य के लिए यह सबसे कीमती तोहफा होता है। आपका विश्वास और प्यार इसी तरह बना रहे मेरे ऊपर बस यही गुजारिश है आपसे।
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