मैं अस्थिर हूं...

मैं स्त्री हूं,
इसलिए मैं अस्थिर हूं,
स्थिर होती तो नहीं
जी पाती दो जिंदगियां
मैं अस्थिर हूं, तभी शायद
जिंदा हूं, दोनों समाज में
एक समाज जो है मेरा खुद का
दूजा जो दूसरों ने बनाया।
अस्थिर हूं इसलिए
बन पाती हूं मां
खुद को भी संभालती हूं
मां के जैसे, और अपने पुरुष
के दिए जीवन को भी।
अस्थिर हूं, क्योंकि नदी हूं
खुद के बहाव को
अपने अंदर के पानी को
चट्टानों के अनुरूप देती हूं मोड़
मेरा अस्थिर होना ही, शायद 
चट्टान को चिकना कर देता है
क्योंकि मेरे पानी ने उसका झेला है
नुकीलापन, तब कहीं जाकर
कर पाई हूं उसे अपने अनुरूप
अस्थिर हूं, तभी तो बना पाई
मन को बावरा, जो ठहरता ही
नहीं कहीं।
अस्थिर हूं, इसलिए किसी एक भाव
पर टिकती नहीं हूं, हर भाव को
समरूप जीती हूं।
अस्थिर हूं, तभी शायद मौका मिलते ही
अपने अस्तित्व का छाप छोड़ देती हूं
किसी के मन में,
स्थिर होती तो शायद
गुम हो जाती, टूट जाती या फिर
जाती बिखर
खुश हूं कि अस्थिर हूं, खुश हूं
कि स्त्री हूं

दिव्या

टिप्पणियाँ

  1. अच्छा तो लिखा है, ये अस्थिरता पुरूषों में जिस दिन आ जाएगी उस दिन वो भी संपूर्ण रूप से स्त्री हो जाएगा।

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  2. सही कहा माधव, यह भी कहा जाता है कि एक पुरुष में स्त्री के गुण आ जाएं तो वो बेहतरीन इंसान बन जाता है।

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